एकजुट हो गया पुनः है कौरव - पराजित भीड़,
पार्थ, उठा गांडिव चला दुर्जन पर वो ही तीर।
इस बार नहीं है भीष्म कोई, न बाधा हैं गुरु द्रोण,
शर साध लक्ष्य पर पार्थ, देख मत मुझे खड़े हो मौन।
- आनंद राज 'रीतेय'
" गर खो जाऊँ मैं दुनिया की भीड़ भाड़ में सड़कों पर, निश्चित मेरी कलम एक दिन, मुझको ढूंढ़ निकालेगी। © Reetey AR
एकजुट हो गया पुनः है कौरव - पराजित भीड़,
पार्थ, उठा गांडिव चला दुर्जन पर वो ही तीर।
इस बार नहीं है भीष्म कोई, न बाधा हैं गुरु द्रोण,
शर साध लक्ष्य पर पार्थ, देख मत मुझे खड़े हो मौन।
- आनंद राज 'रीतेय'
अभी - अभी तो बचपन गलियों में गुजरा था,
फिर चलने लगे सड़क पर, जिम्मेदार हो गये।
तब गलतियां छिप जाती थी, बचपन के नाम से,
अब हर भूल के लिए, हम जिम्मेवार हो गये।
अभी - अभी तो उठना सीखा था पैरों पर,
कहा, 'दौड़ जाओ', और हम तैयार हो गये।
फिर कीमतें खुद की ही लगाते हैं रात दिन,
की, खरीदार भी हुए, और साहूकार हो गये।
जिन आँखों का सपना बना आया जहान में,
शहर आकर उन आँखों का इंतजार हो गये।
- आनंद राज 'रीतेय'
बस कुछ और पल, यूँ कह कह के,
रतजगे कराए है तुमने।
खुद सो भी गयी, बिन बतलाए,
मेरी नींद उड़ाए है तुमने।
कई बार हुआ है ऐसा भी,
मैं बैठा रहा, तुम आयी नहीं।
खायर, क्या शिकायत तुमसे करुं,
कम होग, जब तुम कह दोगी
कि, अनजान थी तुम इन बातों से,
रातों से, जज्बातों से....
तुम्हें, ये जहां दिखाया है हमने।
तुम्हें इश्क़ सिखाया है हमने।
यूँ तो हर रोज मुलाकात अपनी हो ही जाती है,
पर मैं मंच पर आकर, तुमसे मिलूंगा एक दिन।
मेरी कविता, कवि नहीं हूँ मैं, बनूंगा एक दिन।
गुजर गयी एक हवा ज्ञान की हिंदुस्तां से होकर,
रो रहा देश शोकाकुल हो एक महामना को खोकर।
कौन यहाँ कहता है कि धरती से इक इंसान गया,
वीरान पड़ी हर गलियां है, लगता है हिंदुस्तान गया।
तू भारत का ज्ञान दीप, विज्ञान जगत का तारा है,
जो रहे हमेशा उदीयमान, तू वो अनमोल सितारा है।
तू इ़ंसान वही जिसका हर कर्म धर्म से ऊपर था,
जो लिए चमक दिनकर जैसा, इकलौता भारत भू पर था।
है ऋणी तेरा संपूर्ण जगत, तू मानवता का अग्रदूत,
किस आँचल से फिर पायेगा, भारत तुम जैसा सपूत।
तू था वो इंसान जिसके हाथों में कुरान और गीता था,
नहीं किसी दल के अधीन, जो मानवता का नेता था।
तू युवा देश की युवा सोच, हिंदुस्तां के प्रेरणास्रोत,
एक शिक्षक आजीवन थे तुम, तुम भारत के स्वाभिमान।
तुझमें बसती थी राजनीति, तुझसे पाया 'अग्नि' उड़ान,
तू रत्न वही गौरव करता जिस पर भारत का संविधान।
तू विदा हुआ इस धरती से, पर व्याप्त रहेगा जन जन में।
दिव्य ज्ञान विज्ञान की ज्योति, सर्वदा जलाता हर मन में।
आदर्श मेरे, मेरे कलाम, कुछ तुम्हें समर्पित करता हूँ,
श्रद्धांजलि हैं ये शब्द मेरे, मैं तुझपर अर्पित करता हूँ ।
भारत के ११वें राष्ट्रपति, विज्ञान जगत के महास्तंभ, देश रत्न डाक्टर अबुल पाकिर जैनुलआब्दिन अब्दूल कलाम को समर्पित।
शत शत नमन् !!
© आनंद राज