Saturday, 26 November 2016

अर्जुन ...

एकजुट हो गया पुनः है कौरव - पराजित भीड़,
पार्थ, उठा गांडिव चला दुर्जन पर वो ही तीर।

इस बार नहीं है भीष्म कोई, न बाधा हैं गुरु द्रोण,
शर साध लक्ष्य पर पार्थ, देख मत मुझे खड़े हो मौन।

- आनंद राज 'रीतेय'

Friday, 28 October 2016

इंतजार हो गये...

अभी - अभी तो बचपन गलियों में गुजरा था,
फिर चलने लगे सड़क पर, जिम्मेदार हो गये।

तब गलतियां छिप जाती थी, बचपन के नाम से,
अब हर भूल के लिए, हम जिम्मेवार हो गये।

अभी - अभी तो उठना सीखा था पैरों पर,
कहा, 'दौड़ जाओ', और हम तैयार हो गये।

फिर  कीमतें खुद की ही लगाते हैं रात दिन,
की, खरीदार भी हुए, और साहूकार हो गये।

जिन आँखों का सपना बना आया जहान में,
शहर आकर उन आँखों का इंतजार हो गये।

- आनंद राज 'रीतेय'

Monday, 24 October 2016

अब दिवाली में भला...

अब दिवाली में भला दीपक जलाता कौन है!

मेरे घर में दो दीया गर, एक दीया तेरे घर भी हो,
छत के नीचे हम रहें तो, छत तुम्हारे सर भी हो।
सच, गांव में भी आजकल संबल जताता कौन है...
अब दिवाली में भला दीपक जलाता कौन है!

हम नये होते गये, रस्मों -रिवाजें तोड़ कर,
शहरवाले हो गये हैं, गांव पीछे छोड़कर।
देखकर पीपल को भी अब, सर झुकाता कौन है..
अब दिवाली में भला दीपक जलाता कौन है!

न्यायालयों में तोड़ती दम, न्याय इंतजार में
अब झूठ के लगने लगे हैं, कीमतें बाजार में।
फिर दिन को दिन और रातों को, रातें बताता कौन है...
अब दिवाली में भला दीपक जलाता कौन है!

मिट्टी से रिश्ते हमारे, मिल रहे हैं धूल में,
फिर भी यारी आसमां से, कर रहे किस भूल में!
सच, जेब के सिक्कौं की अब कीमत बताता कौन है..
अब दिवाली में भला दीपक जलाता कौन है!

- आनंद राज 'रीतेय'

Sunday, 18 September 2016

खत्म कर दो...!

बाज हो पर  डर रहे हो,
सांप से तुम किसलिए?
पड़ गयी कमजोर आँखें,
या पंजों में ताकत नहीं है!
दिन ब दिन तेरे घोसले से,
बच्चे गायब हो रहे हैं।
जानते हो पर बताओ
कितने, कब तक गायब होंगे ?
तुम बदल सकते नहीं वो घोसला,
जो वर्षों से उस पेड़ पर है,
है घर तुम्हारा।
और तुम्हारे घोसले के ठीक नीचे,
केंचुल में खुद को छुपाए,
छुपा एक सांप, जड़ो की आड़ में है।
जानते हो, पर हटा सकते नहीं तुम,
घर है उसका, छोड़कर वो क्यूं हटेगा?
जानता हूँ, तुमने समझाया बहुत है,
पर तुम्हारी बातें कब समझी गयी है!
शेष अब, बस एक ही युक्ति बची है,
काम लाओ चोंच और पंजे को अपने,
झोंक दो ताकत, बची है जो भी वय में।
खींचकर बाहर निकालो,
खत्म कर दो।
अब देर मत करना...
नहीं तो एक दिन ये भी घटेगा,
शाम को लौटोगे तुम जब घोसले में,
ठीन नीचे, फैलाये फन फुफकारेगा वो...।
और उपर घोसले में,
बस तुम, अकेले तुम, अकेले तुम बचोगे।
- आनंद राज 'रीतेय'

Sunday, 28 August 2016

तुम्हें इश्क़ सिखाया है हमने...

बस कुछ और पल, यूँ कह कह के,
रतजगे कराए है तुमने।
खुद सो भी गयी, बिन बतलाए,
मेरी नींद उड़ाए है तुमने।
कई बार हुआ है ऐसा भी,
मैं बैठा रहा, तुम आयी नहीं।
खायर, क्या शिकायत तुमसे करुं,
कम होग,  जब तुम कह दोगी
कि, अनजान थी तुम इन बातों से,
रातों से, जज्बातों से....
तुम्हें, ये जहां दिखाया है हमने।
तुम्हें इश्क़ सिखाया है हमने।

Thursday, 25 August 2016

इस बात को वर्षों हुए...

चेहरे पर मासूमियत लिए ,
जो बनावटी नहीं है।
वो खड़ा है,
उस पेड़ की छाया में।
जिसके छाया पर,
उसका हक पहला है।


अनजान है वो,
हर बात से,
जीवन के हर हालात से।
उजाले दिन से,
और काली रात से।
न खबर है उसे,
न कोई परवाह।
हुआ कल क्या?
क्या कल होगा?
फिर भी,
वो सचमुच खुश होगा,
उस   छाया में,
जिसपे उसका हक पहला है।

उसे विश्वास है,
पेड़ के जड़ पर।
जो पुराना नहीं है।
उम्मीद है उसे,
वर्षों तक के साथ का।
एक अटूट रिश्ता ,
जो चलेगा उम्रभर।


वक्त ने करवटें बदला,
कुछ ऐसा हुआ,
जो ना होना था।
वो भयानक रात,
वो आंधी,वो तूफान।
पर बेफिक्र वो सोया रहा,
सुबह हुई,आँखे  खुली ,  
सब कुछ बदल चुका था।
न वो रिश्ता रहा,
न वो छाया बचा।
उस आँधी में वो पेड़,
धराशायी हो चुका था।

इस बात को,
वर्षों हुए ।
बच्चा बड़ा हो चुका है,
समझने लगा है,
अपने जज्बातों को,
जीवन के हर हालातों को।
पर जब भी झांकता है,
वो अपने बीते कल में,
एक सूनापन लगता है,
बिना उस पेड़ के।
जिसपर ,
उसका हक पहला था।

अब वो पेड़,
वापस नहीं आएगा।
ना वापस आएगी,
उसकी मासूमियत।
पर आज भी,
महसूस होती है,
उस छाया की कमी।
और अफसोस भी,
की वो सींच नहीं पाया,
उस पेड़ के जड़ को,
जिसपर,
उसका हक पहला था।


-आनंद राज 'रीतेय'
(आत्म-कृति)

महान भारत का महाभारत


‘महाभारत’ ये शब्द सुनते ही मस्तिष्क में एक ही विचार कौंधता है, वही महाभारत,जिसका वर्णन महर्षि वेदव्यास ने किया था। और जिसे बी आर चोपड़ा तथा रामानंद सागर जैसे निर्माता ने दूरदर्शन के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया। पर आज मैं उस महाभारत को दोहराऊंगा नहीं। क्योंकि ये एक पन्ने में कदाचित संभव नहीं है।अपितु जिस महाभारत का वर्णन मैं करने जा रहा हूँ, उसे भी पन्नों में समेटना संभव नहीं है। परंतु संक्षिप्त वर्णन हो तो शायद समेटना संभव हो जाए। ये महाभारत है वर्तमान भारत की। उस भारत की जिसमें हम सभी जी रहे हैं।
यहाँ युद्ध क्षेत्र सिर्फ कुरुक्षेत्र नहीं है,और न ही राजसिंहासन सिर्फ हस्तिनापुर में।आज के इस महाभारत में संपूर्ण देश कुरुक्षेत्र बना हुआ है,और कुरुवंशी भी सर्वत्र हैं। और एक भी ऐसा मनुष्य नहीं जिसे इस महाभारत के भविष्य का ज्ञान हो,परंतु भनक हर कानों तक है।
वो महाभारत जो सदियों पहले हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण सब जानते थे। वो चाहते तो रोक सकते थे महाभारत को, तभी जब युद्ध जैसी कोई बात नहीं थी। परंतु उन्होंने होने दिया उस महायुद्ध को, शायद इसलिए कि आने वाली समस्त पीढ़ी इससे कुछ सीख ले। और भविष्य में फिर कोई महाभारत न हो, और लोगों ने सीखा भी परंतु वो नहीं जो भगवान श्रीकृष्ण सिखाना चाहते थे। आज किसी को वीर अभिमन्यु  के अतुलनीय साहस और युद्धकौशल से सीख नहीं मिलती। हर मनुष्य गांडिव धारी अर्जुन समान यश, मान, वैभव और प्रतिष्ठा के लिए ललायित रहता है, परन्तु बिना कुछ किये। लोग अंगराज कर्ण की भाँति ‘गुदड़ी का लाल’ कहलाना चाहते हैं, परंतु ये नहीं देखना चाहते कि नदी में बहती हुई पिटारी से लेकर महायुद्ध महाभारत की आखिरी शाम तक वो सिर्फ कांटों पर चला। अपितु वो सुर्य-पुत्र था, परंतु संघर्षों के बादल ने कभी उसे चमकने नहीं दिया। किसी को उसकी दानवीरता की भनक नहीं लगती, जिसे निबाहते-निबाहते उसे अपनी खाल समान कवच-कुंडल तक त्यागनी पड़ी। और उसके द्वारा प्रदर्शित मित्रता सचमुच दुर्लभ है।
इन सबसे इतर लोगों ने किसी और को अपना आदर्श बना लिया। लोगों ने आदर्श बनाया है, गंधार नरेश शकुनि को, जिसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था – हस्तिनापुर का नाश। और शायद उसी में उसकी संतुष्टि थी। वो कदापि दुर्योधन का समर्थक नहीं था। लोगों ने अनुकरण किया है दुर्योधन का, जो कि महत्वाकांक्षा के भूख में सब कुछ भूल बैठा। राजकुल का सम्मान, हस्तिनापुर का वैभव और कुरुवंश की साख। जन्मांध तो धृतराष्ट्र थे, परंतु सत्ता की ललक ने दुर्योधन को अंधा कर दिया। आज हमारे चारों ओर सत्ता के भूखे कइयों दुर्योधन, काले बादलों की भाँति मंडराते फिर रहे हैं। और दुस्सासन तो आपको हर गली-चौराहे पर मिल जाएगा , जो चीर-हरण के लिए सदैव तत्पर रहता है। आज के युग में कोई भी चौराहा कभी भी हस्तिनापुर का राजसभा बन जाता है, और कोई भी अबला द्रौपदी। और आसपास खड़े लोग, मूक दर्शकों की भाँति निहारते रह जाते हैं। वो देखते हैं परंतु अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाते, क्योंकि उन्हें डर है, आज के कौरवों से। वो डरते हैं, क्योंकि आज कोई अर्जुन नहीं है, जो कौरवों का सामना कर सके।
तब के लोग अपने आपको धर्म और अधर्म के नाम पर पृथक कर लिए थे, तो गांगेय भीष्म और गुरू द्रोणाचार्य समान कुछ महात्माओं ने अपने कर्तव्यों के तले दबकर खुद को अधर्म के साथ जोड़ा लिया। परंतु आज कर्तव्य तो किसी को याद नहीं, पर बांट लेते हैं खुद को राजनीतिक दलों के नाम पर। आज के शासक भी धर्मराज युधिष्ठिर जैसे प्रतापी और सत्यवादी नहीं हैं। वो गांगेय भीष्म समान प्रण तो लेते हैं, परंतु प्रण कभी पूर्ण नहीं कर पाते। आज शासक पहले जाति और धर्म के नाम पर अपना साम्राज्य विस्तार करते हैं, और जब राजनीतिक जंग जीतकर वो सत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ होते तो घोषणा करते हैं कि, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए यहाँ जात-पात और धर्म के नाम पर बंटवारा नहीं होना चाहिए। और तब मासूम जनता हाथ मलकर यही सोचती रह जाती है कि ये तो फिर से उल्लू बना गया।
सचमुच तब के महाभारत का अंत तो एक युद्ध से हो गया था, परंतु आज का ये महाभारत कैसे रुकेगा? ढूंढना होगा हमें एक अर्जुन को, जो समस्त कौरवों को धूल चटा सके। ढूंढना होगा एक कृष्ण को,जो सही मार्गदर्शन दिखा सके।
हर हाल में इस महाभारत को रोकना जरूरी है। यदि ये नहीं रुका तो अपने गौरवशाली अतीत के बूते विश्व गुरु कहलाने वाला भारत अपने स्वाभिमान को जल्द ही खो देगा।

-आनंद राज 'रीतेय' 

Sunday, 31 July 2016

कलम

कलम अमीरी दे या ना दे,
पर नाम अमर कर देती है।

Friday, 29 July 2016

तुमसे मिलूंगा एक दिन...

यूँ तो हर रोज मुलाकात अपनी हो ही जाती है,
पर मैं मंच पर आकर, तुमसे मिलूंगा एक दिन।
मेरी कविता, कवि नहीं हूँ मैं, बनूंगा एक दिन।

Tuesday, 26 July 2016

मेरा भारत, मेरे कलाम...

गुजर गयी एक हवा ज्ञान की हिंदुस्तां से  होकर,
रो रहा देश शोकाकुल हो एक महामना को खोकर।
कौन यहाँ कहता है कि धरती से इक इंसान गया,
वीरान पड़ी हर गलियां है, लगता है हिंदुस्तान गया।

तू भारत का ज्ञान दीप, विज्ञान जगत का तारा है,
जो रहे हमेशा उदीयमान, तू वो अनमोल सितारा है।
तू इ़ंसान वही जिसका हर कर्म धर्म से ऊपर था,
जो लिए चमक दिनकर जैसा, इकलौता भारत भू पर था।

है ऋणी तेरा संपूर्ण जगत, तू मानवता का अग्रदूत,
किस आँचल से फिर पायेगा, भारत तुम जैसा सपूत।
तू था वो इंसान जिसके हाथों में कुरान और गीता था,
नहीं किसी दल के अधीन, जो मानवता का नेता था।

तू युवा देश की युवा सोच, हिंदुस्तां के प्रेरणास्रोत,
एक शिक्षक आजीवन थे तुम, तुम भारत के स्वाभिमान।
तुझमें बसती थी राजनीति, तुझसे पाया 'अग्नि' उड़ान,
तू रत्न वही गौरव करता जिस पर भारत का संविधान।

तू विदा हुआ इस धरती से, पर व्याप्त रहेगा जन जन में।
दिव्य ज्ञान विज्ञान की ज्योति, सर्वदा जलाता हर मन में।
आदर्श मेरे, मेरे कलाम, कुछ तुम्हें समर्पित करता हूँ,
श्रद्धांजलि हैं ये शब्द मेरे, मैं तुझपर अर्पित करता हूँ ।

भारत के ११वें राष्ट्रपति, विज्ञान जगत के महास्तंभ, देश रत्न डाक्टर अबुल पाकिर जैनुलआब्दिन अब्दूल कलाम को समर्पित।

शत शत नमन् !!

© आनंद राज

मैं इंतजार में हुँ...

जब शाम की ठंढी धूप,
पेड़ के पत्तों से छनकर तुम तक आ रही होगी।
और अपारदर्शी पर्दा बन तुम्हारी जुल्फें,
रोकती रहेगी कि, कोई किरन मुझ तक न पहुँचे।
जब हरी घास बिस्तर सी होगी,
और असीम ख्वाबों से भरा मेरा सर,
टिकी होगी तुम्हारी गोद में।
तुम्हारी झुकी नजरें, ताक रही होगी मुझको,
और मैं, देखकर तुम्हारी नजरों में,
कुछ कह रहा होउंगा....
मैं इंतजार में हुँ और मेरी अधूरी कविता भी,
जो शायद तुम्हें मिल के पूरी हो जाएगी।
© आनंद राज 'रीतेय'

जो तू होती, जो मैं होता...

कभी कभी सोचा करता हूँ ,
मन में  उठती हर बातों को , 
स्याही में काश बदल पाता। 
लिख पाता हर एहसासों को,
पन्नों में जीवन दे पता। 

पलकें बंद किये रहता मैं ,
और सामने तुम  मेरे आती।
आँखें बंद रहे या जागे ,
दूर नहीं पर तुम जाती। 
देखा करती तुम भी मुझे,
कि जैसे मैं सोचा करता हूँ। 
फिर तेरे आँखों की गुस्ताखी 
देख कभी मैं शर्माता। 
सपने और हसीं होती,
जो तू होती, जो मैं होता। 

खुले गगन  के नीचे हम तुम,
बुनते ख्वाब सितारों में।  
कभी कभी खोया करता मैं,
तुम संग मस्त बहारों मे। 
तुम बन जाती पुष्प और मैं,
भंवरा बन तुझपर गाता। 
ये जीवन और हसीं होती,
जो तू होती, जो मैं होता।  

ढूंढा करता मैं भी किसी को,
जब घिर जाता तन्हाई में। 
पा लेता हर बार तुझे मैं,
यादों की गहराई में।    
याद में मेरी तू  खोती , और 
याद तुझे  कर मैं सोता।
ये रातें और हसीं होती,
जो तू होती , जो मैं होता। 

- आनंद राज 'रीतेय'