Monday, 20 October 2014

दीपावली

स्वच्छ भारत का हो स्वच्छ दीपावली,
पटाखे गूँजे नहीं, न हो आहत कोई।
मिलकर फूलझड़ियां ही अब जलाएंगे हम।
जला दीपक, दीवाली मनाएंगे हम।

एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
जिसने मानव बना हमको जीवन दिया।
एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
जिसने निस्वार्थ हो मार्गदर्शन किया।

एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
जिसके दम से तिरंगा ये लहरा रहा।
एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
चाँद तक देश को जो है पहुँचा रहा।

अब जलाएंगे दीपक हम उसके लिए,
जिसके बूते सलामत,राष्ट्र की आण है।
अब जलाएंगे दीपक हम उसके लिए,
जो रत्न है देश का, देश की शान है।

एक दीपक जलाएँ उस माँ के लिए,
पुष्प आंचल का है जिसने अर्पित किया।
एक दीपक जलाएँ, आओ उस नाम से,
लोकहित में है जो नर समर्पित हुआ।

मन की ज्योति जलाने का त्यौहार ये,
इसमें शामिल ईश्वर की हर संतान हो।
धर्म के नाम पर कोई विभक्ति न हो,
ज्ञान दीपक जलाता हर इंसान हो।

अंधियारे में न हो मन का कोना कोई,
दीप संज्ञान का अब जलाएंगे हम।
स्वच्छ भारत का हो स्वच्छ दीपावली,
जला दीपक, दीवाली मनाएंगे हम।


© आनंद राज 

Saturday, 4 October 2014

रावन का रूदन...



कल रात रावन, मेरे सपनों में आया।
तार तार होते दिल के दुखड़े सुनाया।
आकर मेरे पास मुझसे वो बोला,
व्यथा की पिटारी व्यथित होकर खोला।

कहा मैंने उससे-
" थके होगे आप, जाओ बिस्तर पकड़ लो।
मुझे सोने दो, आप भी आराम कर लो।
सुबह दोनों जागेंगे, फिर बात होगी।
दिन के उजाले में, मुलाकात होगी।"

कहा रावन ने फिर -
सुनो तुम, मेरे पास वक्त बहुत कम है।
ये देखो आज लंकेश की आँखें नम है।
हजारों की भीड़ ने फिर से है घेरा।
और देखो कोई राम बनके खड़ा है।
जलाएगा फिर बाणों से मैं जलूंगा।
घृणा की ये ज्वाला, मैं कब तक सहूंगा।

सीता हरण कर किया पाप मैंने।
भोगा है बदले में कई संताप मैंने।
उसी पाप के बदले लंका जली थी।
अट्टालिकाएं जा धूलों में मिली थी।
नगर ही नहीं, नगरवासी भी खोया।
भाई-बेटों को खोकर, तन्हा मैं रोया।

और जिसे भारतवासी समझते हैं पाप,
था वो मेरा प्रत्युत्तर, था मेरा प्रतिघात।
देख भगिनी की कटी नाक ,
कैसे खामोश रहता ?
लगे कुल पे कलंक,
मैं कैसे चुपचाप सहता ?
बोलो, वीरता पहले दिखाई था किसने?
बोलो, तलवार पहले उठायी था किसने?

किया मैंने जो भी, उसका परिणाम आया।
था युद्ध रूपी बादल मेरी लंका पर छाया।
फिर मुमकिन नहीं था, पैर पीछे हटाना।
कहीं उससे बेहतर था, सर को कटाना।

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कटाया सर अपना, जो किया मैंने पाया।
असुर होकर सुर से था मुट्ठी भिड़ाया।
मेरे पाप का शायद प्रायश्चित वही था।
किया राम - रावन ने जो था सही था।

मरा मैं तभी, फिर से क्यूँ मारते हो?
बनाकर मुझे, फिर से क्यूँ डाहते हो?

मैंने, तुम भारतवासी का क्या है बिगाड़ा,
जो संतुष्ट होते हो मुझको जलाकर।
और दिन दहाड़े, जो लूटते हैं तुमको,
करते हो स्वागत उसका ताली बजाकर।

जलाना है तो जाओ उसको जलाओ,
जो है तेरे रगों का लहू आज पीता।
पावन इस पावक से उसको नहलाओ,
वजह जिसके सिंदूर मिटाती है 'सीता'।

मेरी कैद में साल भर वो रहीं थी।
माना कि वो भी प्रताड़ित हुईं थी।
मगर उसका क्या,
जिसने दो सौ बरस तक,
घर में जकड़, 'भारत माता' को रखा।
जाओ ढूंढ़ो उसे, और उसको जलाओ।
फिर नाचो खुशी में, विजयोत्सव मनाओ।

फिर भी लगे गर कि मैं ही हूँ पापी,
मुझे घेरकर के तुम फिर से जलाना।
मगर एक विनती, सुनो भारतवासी,
तुममें से कोई जलाने न आना।
क्योंकि,
अगर रावन गलत था,
तो सही तुम भी नहीं हो।
क्या जो राम थे,
सचमुच तुम भी वही हो ?

जलूंगा उसी राम के हाथों फिर मैं,
मरूँगा उसी राम के शर से फिर मैं,
मर्यादापुरुषोत्तम, वो आदर्श मानव,
जो इंसान बनके था भगवान आया।

- आनंद राज