Wednesday, 28 January 2015

अपनी जान की असली कीमत , जिसने हमको समझाया ,
'आज़ाद-हिन्द' का परचम जिसने, विश्व-पटल पर लहराया
हुआ समर्पित राष्ट्र-प्रेम में , लगा दिया जिसने जीवन ,
मातृभूमि के उष सुभाष को, मेरा शत शत बार नमन 

इतनी काली काया लेकर, क्यों स्वच्छ बने फिरते हो तुम?

इतनी  काली काया लेकर,
क्यों स्वच्छ बने फिरते हो तुम?

खुद को भगवान बताते हो,
तुम आत्मसिद्धि पा लेते हो,
फिर झूठी  झूठी  बातें कहकर,
क्यों लोगों को झुठलाते हो?

है वस्त्र भले ही श्वेत तेरा,
पर स्वच्छ कहाँ जीवन में हो।
है पाँच सितारी ठाट बाट,
और कलुषित अंतरमन से हो।

'आशा' विहीन एक नर हो तुम,
है 'राम' नाम की ढ़ोंग तेरी।
'बापु' कहलाये जाते हो,
है हवसी,पापी सी नियत तेरी।

क्यों ईश्वर को ही ढ़ाल बना,
तुम काम घिनौने करते हो?
जिस नाम सहारे पेट पले,
शर्मसार उसे ही करते हो।

तेरा  अपना असली स्वरूप,
बरबस ही बाहर आया है।
काल कोठरी ने तुझको,
आखिरकार गले लगाया है।


आनंद राज