Sunday, 17 November 2019

दस्तखत



सुबह का समय था। गोपाल बाबू रोज की तरह तैयार हो रहे थे ताकि सुबह की साढ़े सात वाली ट्रेन पकड़ सके। ऑफ़िस क़रीब ३ घंटे की दूरी पर थी अतः सुबह की ट्रेन छूट जाए तो ऑफ़िस नहीं  जाने कि अलावा कोई और उपाय भी नहीं था। राज्य सरकार कि किसी हाई स्कूल में भौतिकी और गणित पढ़ते थे गोपाल बाबू और हम ९ से ५ वालों के तरह उनके पास वर्क फ़्रम होम जैसे सुविधाएँ नहीं थी। यूँ  तो उनका शिक्षक बनाना अपने आपमें एक लम्बी कहानी है पर आज जिसकी ज़िक्र होनी है वो कहानी कुछ और है।

सुबह के ७ बज चुके हैं , गोपाल बाबू अपना झोला उठा कर स्टेशन की ओर निकलने ही वाले हैं। इसी बीच उनकी माँ ने आवाज़ लगायी।
- अरे गोपाल, एक बात पूछनी थी।
- कहो माँ।
-अच्छा ये बताओ, ये बैंक क्या होता है?
-माँ, बैंक वही होता है जहां लोग पैसा जमा करते हैं।
-अच्छा, तो वह हर कोई पैसा जमा करा सकता है?
- हाँ, हर कोई (गोपाल बाबू ने बात को जल्दी ख़त्म करने की सोच कर सीधा सा जवाब दिया और आँगन से बाहर आ गये)
इससे पहले की माँ कुछ और पूछती, समय की नज़ाकत को ज़हन में रखते हुए गोपाल बाबू स्टेशन की ओर चल पड़े। 

स्टेशन करीब १० मिनट की दूरी पर था। गोपाल बाबू स्टेशन की ओर चल रहे थे और साथ ही साथ माँ की बात उनके मन में। गोपाल बाबू यह बात बख़ूबी जानते हैं कि उनकी माँ जिज्ञासु हैं और उन्होंने किसी को बोलते सुना होगा बैंक के बारे में।

सोचते सोचते गोपाल बाबू स्टेशन पहुंचे, गाड़ी पकड़ी और चले गये ं। वो बात स्टेशन पर रह गयी, शायद इंतज़ार में कि जब गोपाल बाबू वापस लौटेंगे तो बात उनके साथ वापस घर तक जाएगी।

इधर माँ ने गोपाल बाबू की बात, की बैंक में कोई भी पैसा जमा करवा सकता है, को सोचती रही। अपना संदूक खोला, सारे पैसे निकाले और बरामदे के एक किनारे पर रख दिया। वो नहीं जानती थीं कि किस सिक्के या फिर नोट की क्या कीमत है। जो सिक्के या नोट एक जैसे दिखे, एक साथ रख दिया।

दिन निकल गया। इधर माँ अपने हिस्से की काम काज निबटाती रहीं। उधर गोपाल बाबू अलग-अलग कक्षाओं में गणित और भौतिकी पढ़ाते रहे। माँ की बात स्टेशन पर इंतज़ार करती रही और पैसे अपने गिने जाने के इंतज़ार में बरामदे में पड़ा रहा। 

शाम की बत्ती जलाई जा चुकी थी। ट्रेन की सीटी बजी। माँ अपने बाकी के बचे जिज्ञासाओं के साथ दरवाजे के सामने वाले मचान पर इंतज़ार कर रही थी। गोपाल बाबू जैसे ही लौटे और कपड़े बदल कर माचान की तक आए, माँ की बाकी बची जिज्ञासाएं भी एक एक कर सामने आने लगी और माँ बेटे का वार्तालाप चलता रहा।

माँ ने कहा, गोपाल मुझे भी अपने पैसे बैंक में जमा कराने हैं।
गोपाल बाबू थोड़े हैरान हुए और पूछ बैठे की माँ आपके पास तो संदूक है ही। उसी में रखा करो आप। 
नहीं नहीं कल वो जो खेत में काम करने आयी थी, बता रही थी की उसके मुहल्ले में परसों रात चोरी हो गई। क्या पता कल कोई मेरा संदूक ही उठा ले जाए?
गोपाल बाबू माँ की बात समझ तो गये थे पर कहीं न कहीं बात टालने की मुद्रा में ही थे। 
उन्होंने कहा, माँ ऐसा करो कि आप पैसा मुझे दे दो और मैं अपने खाते में जमा करवा दूंगा।
नहीं नहीं, मुझे अपने खाते में करवाना है।
माँ पर बैंक खाते के लिए आपको अपना दस्तखत करना होगा या फिर अंगूठा का निशान लगाना होगा? और अंगूठा तो आप लगाओगी नहीं।

गोपाल बाबू जानते थे कि माँ अंगूठे का निशान नहीं लगाएंगी, क्योंकि सालों पहले, गोपाल बाबू के पिता के देहावसान के उपरांत, जब गोपाल बाबू ५ साल के भी नहीं थे, किसी ने धोखे से माँ का अंगूठा निशान लेकर सारी ज़ायदाद अपने नाम कर लिया था। और जब ये बात बाद में उन्हें पता चली और उन्हें बेघर होना पड़ा, तो माँ ने ये कसम खायी थी कि ज़िंदगी में कभी अंगूठे का निशान नहीं लगाएंगी।

माँ ने कुछ देर सोचा और कहा कि मैं दस्तखत करूंगी और दस्तखत करके ही जमा कराऊंगी अपने पैसे।

-लेकिन माँ, आपको तो आता ही नहीं है दस्तखत करना?
-तो सीखूंगी, क्यों ये सीख नहीं सकती मैं?
-हाँ, सीख तो सकती हो आप लेकिन कैसे, ये सोच रहा हूं।
-स्कूल में सबको जोड़-घटाव सिखाते हो, मुझे दस्तखत नहीं सिखा पाओगे? ये सवाल उस औरत की थी जिसकी जीवन संघर्षों पर किताबें लिखी जा सकती है। 
खायर, गोपाल बाबू ने कहा..
-हाँ माँ, कल सिखाता हूं आपको।

गोपाल बाबू समझ चुके थे कि माँ ने निश्चय कर लिया है तो बिना बैंक में पैसे जमा कराए नहीं मानेगी। 

और अगर पूरी वर्णमाला सिखाने लगे तो काफ़ी वक्त भी लगेगा और माँ के नाम की सारे अक्षर वैसे भी वर्णमाला के आख़िरी वाले हैं।

अगली सुबह आफिस जाने के पहले गोपाल बाबू ने कोई पूरानी कापी के एक खाली पन्ने पर पहली लाइन में माँ का नाम लिखा और माँ से कहा की आप ये देख कर बाकी की लाइनों में लिखो। 
मैं शाम को नयी कापी ले आऊंगा। आप एक बार हस्ताक्षर सीख जाओगी तो हम बैंक चलेंगे और आपके पैसे जमा करा आएंगे।

दिन फिर से गुज़रा.. हमेशा की तरह आज भी माँ के पास काम बहुत थे लेकिन उन्होंने सिर्फ वही किया जो सबसे ज्यादा जरूरी था।

शनिवार की वज़ह से गोपाल बाबू शाम धूंधलाने के पहले घर लौट आए थे। जैसे ही वापस आकर गोपाल बाबू ने नयी कापी और क़लम माँ को पकड़ाया.. माँ ने पहला पन्ना खोला और एक संतुष्टि भरे एहसास के साथ अपना दस्तखत कर दिया। 

गोपाल बाबू अचंभित थे क्योंकि पूरानी कापी में सिर्फ़ एक ही पन्ना खाली था। 
माँ ने बेटे की हतप्रभता को महसूस किया और खींचकर आंगन ले गयी। पूरा आंगन एक कापी की तरह खुला हुआ और न जाने कितनी बार उस पर माँ ने पूरानी कापी में  देखते हुए लिखा था अपना नाम। 
उस शाम गोपाल बाबू ने  ढलते सूरज के साथ देखा था ख़्वहिश और समर्पण की एक नयी सुबह।


-रीतेय





Tuesday, 22 October 2019

तुम आ जाना

जिस दिन 
बेंजामिन की ख़ोजी हुई ख़ून
अपने रगों में लेकर 
आवश्यकता के अनुरूप या
अनावश्यक होकर
अनवरत दौड़ने वाला,
एडिसन के नवाब-ज़ादे-
बल्ब, स्मार्ट बल्ब, टेबल लैंप
बेड लाईट... वगैरह वगैरह...
मेरा साथ छोड़ दे।



मैं जब ये जान जाऊं,
कि कम से कम,
कितनी रोशनी चाहिए मुझे जीवन में।

जब मुझे किसी के पल-पल,
ज़िंदगी से कम होते जाने का-
एहसास हो जाए।

जब समझ आ जाए मुझे
कविता-ए-जीस्त की लंबाई।

तुम, 
मोमबत्ती बनकर आ जाना। 



-रीतेय

Sunday, 20 October 2019

जंगल की ख़्वाहिश / रीतेय


दुनियाँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं 'अपना राक्षस'।
महसूस कर रहे हैं कमी,
बीहड़ों के डाकुओं की।
दुनियाँभर के तमाम जंगल।



वक़्त लिया है जंगलों ने,
इस फैसले तक आने में!
तब जाकर समझ पाये हैं
कि क्या हैं मुश्किलें..
इस दुनियाँ में रहकर
अपनी दुनियाँ बचाने में।
दुनियांँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं' अपना राक्षस' ।


अब जंगल को कतई नहीं चाहिए,
शेर सा राजा।
क्योंकि,
शेर ने सीख लिया है सर्कस!
घूम आया है चिड़ियाघर!
और, हो चुका है आदी,
मुफ़्त में मिले माँस का ।
शेर ने कर लिया है
शर्तिया समझौता इंसानों से।
समझौता कि, तुम मुझे राजा कहते रहो
और मैं तुम्हें अपना जंगल लूटने दूँगा ।


जंगल जान गया है ये सच
कि, क्यों बनाया था इंसानों ने,
शेर को जंगल का राजा।
दुनियाँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं 'अपना राजा' ।
दुनियाँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं 'अपना राक्षस' ।


जंगल समझ चुका है इन बातों को,
कि नहीं हैं इंसानों को परवाह
अपनी सांसों की।
ख़्वाब, उम्मीद और भावनाओं के साथ-साथ
उसने सीख लिया है बनाना और बेचना
हाइड्रोजन और आक्सीजन। 
कभी साथ साथ तो कभी अलग अलग।
कुछ दिनों में ढूँढ लेगा तरीके -आँधियों के, बारिशों के।

अपने बीचोंबीच या अगल-बगल से
गुजरती सड़कों को देखकर
सहम जाता है जंगल।
इससे पहले कि जंगल
को गुजरना पड़े,
सड़कों के बीच से-
जंगल ढूँढना चाहता है एक राजा!
जिससे भय खाता हो निर्भय इंसान।
दुनियाँभर के तमाम जंगल
ढूँढ रहे हैं 'अपना राजा' ।
दुनियाँभर के तमाम जंगल
ढूँढ रहे हैं 'अपना राक्षस' ।


-रीतेय

Friday, 18 October 2019

दो हाथ और दो जोड़ी आँखें / रीतेय

दो हाथ और दो जोड़ी आँखें / रीतेय



एक वयस्क हाथ के उपर 
रखा हुआ एक नन्हा सा हाथ।
और उसे... एकटक देखती हुई,
दो जोड़ी आँखें।

दोनों जोड़ी आँखें, देख रही होती है,
उन दो हाथों में,
अपना अपना कल।

वो कल, जो गुज़र गया है।
वो कल, जो आया नहीं है।

एक जोड़ी आँखों में है यादें,
यादें गुज़रे बचपन की।
और उम्मीद-
उम्मीद कि, एक दिन नन्हा हाथ 
ढ़क सकेगा वयस्क होकर बूढ़े हाथों को।

और दूसरी जोड़ी आँखें...
बेखबर है, बे परवाह भी,
पर सुकून में है, खुश है।
जानता है कि नीचेवाला हाथ
रहेगा नीचे तब-तक, 
जब-तक उस हाथ को 
सहारे की जरूरत नहीं होती।

ये तस्वीर क्षण भर की है,
और कहानी...
हमेशा हमेशा की।
दो हाथ और दो जोड़ी आँखें।

-रीतेय




Thursday, 10 October 2019

राम की नयी समस्या - (व्यंग्य) - Reetey (रीतेय)

स्वर्गलोक में भगवान विष्णु का दरबार सजा है। अपने अलग अलग अवतारों के फलस्वरूप  वो प्रतिदिन अलग अलग अवतारों में कुछ देर के लिए चले जाते हैं और उन अवतारों से जुड़ी समस्याओं के समाधान में जुट जाते हैं। आज बारी रामराज्य की थी। वैसे तो कांड उन्होंने कृष्ण-अवतार में ज़्यादा किया है परंतु धरती पर जब से कोलाहल बढ़ा है, कृष्ण-अवतार से  कहीं ज्यादा वक्त तक भगवान को रामावतार में रहना पड़ता है।

सभा आरंभ हुई। सभासद वैसे ही विराजमान हैं जैसे कि रामराज्य में हुआ करता था। राम, बगल में जानकी फिर अगल-बगल लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न एवं बाकी सभासद। खुशी की बात यह है कि, आखिरकार राम के साथ सीता भी सभा की हिस्सा हैं। कुल मिलाकर सभा वैसी ही है जैसा की संजय लीला भंसाली के फिल्मों में होता है।




सब थे बस हनुमान नज़र नहीं आ रहे थे। नज़र न आने की वजह ये थी, कि हनुमान बाक़ी सभासदों से अलग अमरत्व की प्रताड़ना झेलने के लिए धरती पर छोड़ दिए गए थे। ऐसी बात नहीं थी कि हनुमान अब राम की सभा में नहीं जाते थे, पर जब भी जाते थे सिर्फ़ राम जन्मभूमि वाले मुद्दे की अपडेट लेकर। राम के नाम पर और कुछ चल भी तो नहीं रहा है धरती पर !

पिछली बार वो सभा में 2014 के आस पास देखे गए थे। फिर 2015 से अब तक उनकी उपस्थिति वैसी ही रही है जैसे की राज्यसभा में मनोनीत सिलेब्रिटीज़ की होती है। उदाहरण के तौर पर आप हनुमानजी की तुलना माननीय सचिन से भी कर सकते हैं। मैं बस राज्यसभा में उपस्थिति की बात कर रहा हूँ ।

सभा आरंभ होते ही भारत ने उत्सुकतावश पूछा, भैया आपने ग़ौर किया है, हनुमान को सभा में आए हुए कई साल हो गए हैं। आपको उनकी ख़बर लेनी चाहिए। मुझे मालूम है की आपको अयोध्या वाले मामले में अब कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन फिर भी.... टुकड़ा कोई और दिलवा रहा हो तो लेने में क्या आपत्ति है।

वो दिन गए कि आप लंका जीतकर विभीषण को सौंप आये। वैसे भी उस टुकड़े के लिए न तो हमारा राजकोष ख़ाली हो रहा है और न ही हमारे सभासदों को कोई परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

समझ लिजिए कि बर्थडे गिफ्ट है। आपको याद है अयोध्या वाले मामले की वजह से आपके भक्तों की संख्या में अचानक से बढ़ोतरी हुई थी। अतः मेरे समझ के अनुसार आपको अयोध्या मामले को हल्के में नहीं लेनी चाहिए। 

राम जी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। रामजी को शांत देख लक्ष्मण बीच में बोल उठे, भैया भरत भाई साहब का कथन सर्वथा उचित है। अयोध्या मामले में आपको दिलचस्पी हो या न हो पर हमें है। हमारा बचपन जुड़ा है यार वहाँ से!

आप कैसे भूल सकते हैं वो सारे दिन (हैस टैग ओल्ड मेमोरिज, #बचपन की यादें #वनवास with सीता एंड ब्रो लक्ष्मण)। ये सब कुछ अयोध्या से ही शुरू हुई थी ।
मातृभूमि की अवमानना? जन्मभूमि से जिरह? आपने सोच भी कैसे लिया? आर्य, ख़ुशक़िस्मत हैं आप की अब आर्यावर्त में नहीं हैं, अगर होते हो मातृभूमि को इस तरह नज़रंदाज़ करने पर देश निकला दिया जाता वो भी अकेले !

राम जी बोले, वैसे मुझे अभी भी अयोध्या वाली ज़मीन में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन मैं लक्ष्मण की ‘बचपन की यादों’ वाली बातों से सहमत हूँ। मंत्रीवर सुमंत के माध्यम से हनुमान को संपर्क किया जाए

हनुमानजी से संपर्क सफल रहा। हनुमान जी सूचना मिलते ही चल पड़े और समयानुसार सभा में उपस्थित हुए। परस्पर अभिवादन के उपरांत बोले, प्रभु मैं आने ही वाला था, किन्तु मन में थोड़ी सी शंका थी, कि इतने दिन बाद अचानक से सभा में कैसे जाऊँ। परंतु अपने संदेश भेज कर मेरा कार्य आसान कर दिया। उपयुक्त समय पर मुझे याद करने के लिए शुक्रिया !

हनुमान को इतना औपचारिक देख कर सीता को थोड़ी हैरानी हुई, उन्होंने कुछ व्यक्त करना चाहा परंतु ना जाने क्या सोचकर ये अवसर भी उन्होंने मार्यदपुरूषोत्तम को दिया ताकि वो अपनी बात कह पाएँ ।

हनुमान को हतप्रभ देख, जानकिवल्लभ ने पूछा- अंजनीपुत्र, तुम्हारी हतप्रभता का मूल क्या है? अयोध्या की समस्या कहीं बढ़ तो नहीं गयी? तुम उसके लिए परेशान ना हो। 

हनुमान जो अपनी बात कहने को तैयार खड़े थे, बोले- प्रभु ! समस्या अयोध्या की नहीं है । लक्ष्मण ने बीच में व्यवधान डालते हुए कहा, ‘ क्या, अयोध्या की समस्या सुलझा दी गयी? बड़े भैया को कोर्ट में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है ?

हनुमान ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, सुलझी नहीं है, लेकिन दूध की तरह गरम कर के ठंडा कर दिया गया है । ज़रूरत पड़ने पर आवश्यकतानुसार फिर से उबला जाएगा! 

खायर, प्रभु, मेरी समस्या कुछ और है। मेरी समस्या का मूल है मेरी ‘जाति परीक्षा’। परीक्षा का नाम सुनते ही सीता से रहा नहीं गया, अचानक बोल उठीं- अर्यपुत्र, ये कौनसी परीक्षा है जो आपने मुझसे नहीं दिलवायी? फिर हनुमान कि तरफ़ देखते हुए पूछा- क्या ये जाती परीक्षा अग्नि परीक्षा से भी कठिन है?

सीता के इस प्रश्न का उत्तर न तो राम के पास था और न ही हनुमान के पास। प्रश्न को निरस्त कर दिया गया।

हनुमान ने अपनी समस्या पर प्रकाश डालते हुए बात आगे बढ़ाई। 

प्रभु, पृथ्वी वासी पिछले कुछ दिनों से मेरी जाति में ज़्यादा रुचि दिखाने लगे हैं। आए दिन सभाओं में मेरी जाति निर्धारित की जा रही है। आपको अपने कृष्ण-अवतार की कर्ण वाली घटना याद है? उससे भी बत्तर स्थिति हो चुकी है मेरी।

मैंने अपनी धर्म और जाति प्रमाण पत्र ढूँढने की अथक कोशिशें की, हिमालय से लंका तक के तमाम पर्वतों पर ढूँढ चुका हूँ... सच कहूँ तो ये काम संजीवनी बूटी ढूँढने से कहीं ज़्यादा कठिन है। दूसरी बात ये है की आपसे मिलने कि पहले मेरी कोई जाति थी नहीं। वैसे भी ये जाति तो इंसानों के द्वारा, इंसानो के अहित में , इंसानो को बाँटने के लिए बनाया गयी थी। मैं तो बंदर था, भगवान होने के पहले!

लक्ष्मण और भरत, इस घटनाक्रमपर तुम्हारी क्या राय है ? राम ने पूछा।
-संजीवनी के बारे में? हाँ, वो हनुमान ने मेरे लिये ही लाया था। शुक्रिया हनुमान!
नहीं, हनुमान की जाति के बारे में । भरत ने समझदारी दिखाते हुए लक्ष्मण को सही प्रश्न से अवगत कराया।

लक्ष्मण ने हनुमान से कहा- हनुमान, तुम अपनी धर्म और जाति वाले कॉलम में ‘हिंदुस्तानी’ क्यूँ नहीं लिख देते? तुम्हारी ज़्यादातर मूर्तियाँ तो भारत में ही है। क्यूँ भरत ब्रो? 

भैया भारत और लक्ष्मण, ये सब फ़िल्मी बातें हैं। 
-मैं ख़ुद को हिंदुस्तानी बताऊँगा तो मेरे नाम पर स्टेट पॉलिटिक्स नहीं हो पाएगा। 
-तो तुम ख़ुद को आंध्रा से अलाइन कर लो ? सबसे ऊँची मूर्ति तो वहीं हैं। 
-लेकिन ज़्यादातर मूर्तियाँ तो नॉर्थ इंडिया  में है। मेरे नाम पर ज़्यदा बिज़्नेस भी नॉर्थ इंडिया में ही है। वहाँ के लोग मुझे साउथ माइग्रेट करने नहीं देंगे। 

वैसे भी ये आपलोगों की भूल है। मुझे धरती पर भेजने से पहले आपको मेरा आधार कार्ड बनवाना चाहिए था!

सभा में चिंता की लहर दौड़ गयी! जन्मभूमि वाले मुद्दे के साथ साथ एक नया मुद्दा! 

राम ज़्यादा चिंतित लग रहें हैं। वजह तो नहीं पता पर शायद ये सोच रहे होंगे कि जंगल में जन्म लिए उनके दोनो बेटों को जेनरल माना जाएगा या अनुसुचित जनजाति (Schedule Tribe)? क्या अगर राम मंदिर बन भी गयी तो उसमें उनके दोनो पुत्रों को अंदर जाने की अनुमति होगी?