Wednesday, 26 November 2014

26/11


26/11

by Anand Raj

वो ताज का दहकना,
मुंबई का दिल दहलना,
जिंदगी की उम्मीद में,
मौत को गले लगाना।
शिवाजी टर्मिनस पर,
गोलियों की वो बौछार।
असहाय भीड़ की,
वो अनगिनत पुकार।
आज भी याद है।
वो जिंदगी के बदले,
मुयस्सर मौत।
वो मानव का,
क्रुरतम करतूत,
नहीं भूलेगा ये भारत,
जिसने खोया
सैकड़ों सपूत।
पाक के नापाक इरादे।
वो शातिं के झूठे वादे।
आज भी याद है।
वीरों की कुर्बानी,
चश्मदीदों की जुबानी।
जिंदगी की यादें,
और यादों में मौत।
वो खूनी शाम,
और खामोश रात।
कोई भुला सकता है क्या?
वो आज भी याद है।

Monday, 20 October 2014

दीपावली

स्वच्छ भारत का हो स्वच्छ दीपावली,
पटाखे गूँजे नहीं, न हो आहत कोई।
मिलकर फूलझड़ियां ही अब जलाएंगे हम।
जला दीपक, दीवाली मनाएंगे हम।

एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
जिसने मानव बना हमको जीवन दिया।
एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
जिसने निस्वार्थ हो मार्गदर्शन किया।

एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
जिसके दम से तिरंगा ये लहरा रहा।
एक दीपक जलाएंगे उस नाम से,
चाँद तक देश को जो है पहुँचा रहा।

अब जलाएंगे दीपक हम उसके लिए,
जिसके बूते सलामत,राष्ट्र की आण है।
अब जलाएंगे दीपक हम उसके लिए,
जो रत्न है देश का, देश की शान है।

एक दीपक जलाएँ उस माँ के लिए,
पुष्प आंचल का है जिसने अर्पित किया।
एक दीपक जलाएँ, आओ उस नाम से,
लोकहित में है जो नर समर्पित हुआ।

मन की ज्योति जलाने का त्यौहार ये,
इसमें शामिल ईश्वर की हर संतान हो।
धर्म के नाम पर कोई विभक्ति न हो,
ज्ञान दीपक जलाता हर इंसान हो।

अंधियारे में न हो मन का कोना कोई,
दीप संज्ञान का अब जलाएंगे हम।
स्वच्छ भारत का हो स्वच्छ दीपावली,
जला दीपक, दीवाली मनाएंगे हम।


© आनंद राज 

Saturday, 4 October 2014

रावन का रूदन...



कल रात रावन, मेरे सपनों में आया।
तार तार होते दिल के दुखड़े सुनाया।
आकर मेरे पास मुझसे वो बोला,
व्यथा की पिटारी व्यथित होकर खोला।

कहा मैंने उससे-
" थके होगे आप, जाओ बिस्तर पकड़ लो।
मुझे सोने दो, आप भी आराम कर लो।
सुबह दोनों जागेंगे, फिर बात होगी।
दिन के उजाले में, मुलाकात होगी।"

कहा रावन ने फिर -
सुनो तुम, मेरे पास वक्त बहुत कम है।
ये देखो आज लंकेश की आँखें नम है।
हजारों की भीड़ ने फिर से है घेरा।
और देखो कोई राम बनके खड़ा है।
जलाएगा फिर बाणों से मैं जलूंगा।
घृणा की ये ज्वाला, मैं कब तक सहूंगा।

सीता हरण कर किया पाप मैंने।
भोगा है बदले में कई संताप मैंने।
उसी पाप के बदले लंका जली थी।
अट्टालिकाएं जा धूलों में मिली थी।
नगर ही नहीं, नगरवासी भी खोया।
भाई-बेटों को खोकर, तन्हा मैं रोया।

और जिसे भारतवासी समझते हैं पाप,
था वो मेरा प्रत्युत्तर, था मेरा प्रतिघात।
देख भगिनी की कटी नाक ,
कैसे खामोश रहता ?
लगे कुल पे कलंक,
मैं कैसे चुपचाप सहता ?
बोलो, वीरता पहले दिखाई था किसने?
बोलो, तलवार पहले उठायी था किसने?

किया मैंने जो भी, उसका परिणाम आया।
था युद्ध रूपी बादल मेरी लंका पर छाया।
फिर मुमकिन नहीं था, पैर पीछे हटाना।
कहीं उससे बेहतर था, सर को कटाना।

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कटाया सर अपना, जो किया मैंने पाया।
असुर होकर सुर से था मुट्ठी भिड़ाया।
मेरे पाप का शायद प्रायश्चित वही था।
किया राम - रावन ने जो था सही था।

मरा मैं तभी, फिर से क्यूँ मारते हो?
बनाकर मुझे, फिर से क्यूँ डाहते हो?

मैंने, तुम भारतवासी का क्या है बिगाड़ा,
जो संतुष्ट होते हो मुझको जलाकर।
और दिन दहाड़े, जो लूटते हैं तुमको,
करते हो स्वागत उसका ताली बजाकर।

जलाना है तो जाओ उसको जलाओ,
जो है तेरे रगों का लहू आज पीता।
पावन इस पावक से उसको नहलाओ,
वजह जिसके सिंदूर मिटाती है 'सीता'।

मेरी कैद में साल भर वो रहीं थी।
माना कि वो भी प्रताड़ित हुईं थी।
मगर उसका क्या,
जिसने दो सौ बरस तक,
घर में जकड़, 'भारत माता' को रखा।
जाओ ढूंढ़ो उसे, और उसको जलाओ।
फिर नाचो खुशी में, विजयोत्सव मनाओ।

फिर भी लगे गर कि मैं ही हूँ पापी,
मुझे घेरकर के तुम फिर से जलाना।
मगर एक विनती, सुनो भारतवासी,
तुममें से कोई जलाने न आना।
क्योंकि,
अगर रावन गलत था,
तो सही तुम भी नहीं हो।
क्या जो राम थे,
सचमुच तुम भी वही हो ?

जलूंगा उसी राम के हाथों फिर मैं,
मरूँगा उसी राम के शर से फिर मैं,
मर्यादापुरुषोत्तम, वो आदर्श मानव,
जो इंसान बनके था भगवान आया।

- आनंद राज

Sunday, 28 September 2014

हिन्दी को अर्पित...

हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।
तू अथाह सागर है खुद में,
एक बूंद भरने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

तू असीम शब्दों की दुनिया,
मैंने कुछ एक शब्द चुना है।
तेरे मोती चुन चुनकर के,
मैंने भी एक हार बुना है।
ये तेरे गले का कंठहार,
तुझको अर्पित करने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

माँ तेरे अनगिनत पुत्र ने,
कलम उठा, यश गान किया है।
तेरे आंचल में छिपकर के,
तेरा ही उत्थान किया है।
मैं भी तेरा एक पुत्र माँ,
तेरे अंक में आज मैं अर्पित,
'आत्म-कृति' करने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

- आनंद राज

Saturday, 27 September 2014

आत्म- कृति के बारे में …

सचमुच हमारे चारों ओर की दुनिया हम से कुछ कहती है, सजीवों और निर्जीवों से भरे इस अद्भुत प्रकृति में कइयों ऐसी चीजें हैं जो हमें अपनी ओर आकर्षित करती है। परन्तु जीवन के व्यस्त दिनचर्या में हमारे पास पर्याप्त समय नहीं होता कि हम उसे सुन पायें, फिर भी कभी-कभी जाने अनजाने में या अवकाश के क्षणों में हम उन चीजों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। हमारी भावनाएं जुड़ जाती है और तब चाह कर भी हम उन भावनाओं को छिपा नहीं पाते। फलस्वरूप वो भावनाएं मूक बनकर चित्र के रूप में, तो कभी वाचाल होकर कहानी अथवा कविता के रूप में उभर आती है ।

मेरी आत्म कृति ऐसी ही भावनाओं एवं संवेदनाओं का शाब्दिक रूपांतरण है।

मेरे शब्दों में ...

कभी कुएं की रस्सी,
कभी पेड़ से गिरते पत्ते।
कभी फूलों पे बैठीं तितली,
कभी मधुमक्खियों के छत्ते।
कभी रेत भरा मरुथल, तो
कभी नदी का किनारा।
देखा जिधर भी मैंने,
सबने मुझे पुकारा।

-आनंद राज 

लेखक - आत्म-कृति 

Tuesday, 12 August 2014

महान भारत का महाभारत




'महाभारत' ये शब्द सुनते ही मस्तिष्क में एक ही विचार कौंधता है, वही महाभारत,जिसका वर्णन महर्षि वेदव्यास ने किया था। और जिसे बी आर चोपड़ा तथा रामानंद सागर जैसे निर्माता ने दूरदर्शन के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया। पर आज मैं उस महाभारत को दोहराऊंगा नहीं। क्योंकि ये एक पन्ने में कदाचित संभव नहीं है।अपितु जिस महाभारत का वर्णन मैं करने जा रहा हूँ, उसे भी पन्नों में समेटना संभव नहीं है। परंतु संक्षिप्त वर्णन हो तो शायद समेटना संभव हो जाए। ये महाभारत है वर्तमान भारत की। उस भारत की जिसमें हम सभी जी रहे हैं।

यहाँ युद्ध क्षेत्र सिर्फ कुरुक्षेत्र नहीं है,और ही राजसिंहासन सिर्फ हस्तिनापुर में।आज के इस महाभारत में संपूर्ण देश कुरुक्षेत्र बना हुआ है,और कुरुवंशी भी सर्वत्र हैं। और एक भी ऐसा मनुष्य नहीं जिसे इस महाभारत के भविष्य का ज्ञान हो,परंतु भनक हर कानों तक है। वो महाभारत जो सदियों पहले हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण सब जानते थे। वो चाहते तो रोक सकते थे महाभारत को, तभी जब युद्ध जैसी कोई बात नहीं थी। परंतु उन्होंने होने दिया उस महायुद्ध को, शायद इसलिए कि आने वाली समस्त पीढ़ी इससे कुछ सीख ले। और भविष्य में फिर कोई महाभारत हो, और लोगों ने सीखा भी परंतु वो नहीं जो भगवान श्रीकृष्ण सिखाना चाहते थे। आज किसी को वीर अभिमन्यु  के अतुलनीय साहस और युद्धकौशल से सीख नहीं मिलती। हर मनुष्य गांडिव धारी अर्जुन समान यश, मान, वैभव और प्रतिष्ठा के लिए ललायित रहता है, परन्तु बिना कुछ किये। लोग अंगराज कर्ण की भाँति 'गुदड़ी का लाल' कहलाना चाहते हैं, परंतु ये नहीं देखना चाहते कि नदी में बहती हुई पिटारी से लेकर महायुद्ध महाभारत की आखिरी शाम तक वो सिर्फ कांटों पर चला। अपितु वो सुर्य-पुत्र था, परंतु संघर्षों के बादल ने कभी उसे चमकने नहीं दिया। किसी को उसकी दानवीरता की भनक नहीं लगती, जिसे निबाहते-निबाहते उसे अपनी खाल समान कवच-कुंडल तक त्यागनी पड़ी। और उसके द्वारा प्रदर्शित मित्रता सचमुच दुर्लभ है।

इन सबसे इतर लोगों ने किसी और को अपना आदर्श बना लिया। लोगों ने आदर्श बनाया है, गंधार नरेश शकुनि को, जिसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था - हस्तिनापुर का नाश। और शायद उसी में उसकी संतुष्टि थी। वो कदापि दुर्योधन का समर्थक नहीं था। लोगों ने अनुकरण किया है दुर्योधन का, जो कि महत्वाकांक्षा के भूख में सब कुछ भूल बैठा। राजकुल का सम्मान, हस्तिनापुर का वैभव और कुरुवंश की साख। जन्मांध तो धृतराष्ट्र थे, परंतु सत्ता की ललक ने दुर्योधन को अंधा कर दिया। आज हमारे चारों ओर सत्ता के भूखे कइयों दुर्योधन, काले बादलों की भाँति मंडराते फिर रहे हैं। और दुस्सासन तो आपको हर गली-चौराहे पर मिल जाएगा , जो चीर-हरण के लिए सदैव तत्पर रहता है। आज के युग में कोई भी चौराहा कभी भी हस्तिनापुर का राजसभा बन जाता है, और कोई भी अबला द्रौपदी। और आसपास खड़े लोग, मूक दर्शकों की भाँति निहारते रह जाते हैं। वो देखते हैं परंतु अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाते, क्योंकि उन्हें डर है, आज के कौरवों से। वो डरते हैं, क्योंकि आज कोई अर्जुन नहीं है, जो कौरवों का सामना कर सके।

तब के लोग अपने आपको धर्म और अधर्म के नाम पर पृथक कर लिए थे, तो गांगेय भीष्म और गुरू द्रोणाचार्य समान कुछ महात्माओं ने अपने कर्तव्यों के तले दबकर खुद को अधर्म के साथ जोड़ा लिया। परंतु आज कर्तव्य तो किसी को याद नहीं, पर बांट लेते हैं खुद को राजनीतिक दलों के नाम पर। आज के शासक भी धर्मराज युधिष्ठिर जैसे प्रतापी और सत्यवादी नहीं हैं। वो गांगेय भीष्म समान प्रण तो लेते हैं, परंतु प्रण कभी पूर्ण नहीं कर पाते। आज शासक पहले जाति और धर्म के नाम पर अपना साम्राज्य विस्तार करते हैं, और जब राजनीतिक जंग जीतकर वो सत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ होते तो घोषणा करते हैं कि, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए यहाँ जात-पात और धर्म के नाम पर बंटवारा नहीं होना चाहिए। और तब मासूम जनता हाथ मलकर यही सोचती रह जाती है कि ये तो फिर से उल्लू बना गया।

सचमुच तब के महाभारत का अंत तो एक युद्ध से हो गया था, परंतु आज का ये महाभारत कैसे रुकेगा? ढूंढना होगा हमें एक अर्जुन को, जो समस्त कौरवों को धूल चटा सके। ढूंढना होगा एक कृष्ण को,जो सही मार्गदर्शन दिखा सके।
हर हाल में इस महाभारत को रोकना जरूरी है। यदि ये नहीं रुका तो अपने गौरवशाली अतीत के बूते विश्व गुरु कहलाने वाला भारत अपने स्वाभिमान को जल्द ही खो देगा।


आनंद राज