'महाभारत' ये शब्द सुनते ही मस्तिष्क में एक ही विचार कौंधता है, वही महाभारत,जिसका वर्णन महर्षि वेदव्यास ने किया था। और जिसे बी आर चोपड़ा तथा रामानंद सागर जैसे निर्माता ने दूरदर्शन के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया।
पर आज मैं उस महाभारत को दोहराऊंगा नहीं। क्योंकि ये एक पन्ने में कदाचित संभव नहीं है।अपितु जिस महाभारत का वर्णन मैं करने जा रहा हूँ, उसे भी पन्नों में समेटना संभव नहीं है। परंतु संक्षिप्त वर्णन हो तो शायद समेटना संभव हो जाए। ये महाभारत है वर्तमान भारत की। उस भारत की जिसमें हम सभी जी रहे हैं।
यहाँ युद्ध क्षेत्र सिर्फ कुरुक्षेत्र नहीं है,और न ही राजसिंहासन सिर्फ हस्तिनापुर में।आज के इस महाभारत में संपूर्ण देश कुरुक्षेत्र बना हुआ है,और कुरुवंशी भी सर्वत्र हैं। और एक भी ऐसा मनुष्य नहीं जिसे इस महाभारत के भविष्य का ज्ञान हो,परंतु भनक हर कानों तक है। वो महाभारत जो सदियों पहले हुआ, तब भगवान श्रीकृष्ण सब जानते थे। वो चाहते तो रोक सकते थे महाभारत को, तभी जब युद्ध जैसी कोई बात नहीं थी। परंतु उन्होंने होने दिया उस महायुद्ध को, शायद इसलिए कि आने वाली समस्त पीढ़ी इससे कुछ सीख ले। और भविष्य में फिर कोई महाभारत न हो, और लोगों ने सीखा भी परंतु वो नहीं जो भगवान श्रीकृष्ण सिखाना चाहते थे। आज किसी को वीर अभिमन्यु के अतुलनीय साहस और युद्धकौशल से सीख नहीं मिलती। हर मनुष्य गांडिव धारी अर्जुन समान यश, मान, वैभव और प्रतिष्ठा के लिए ललायित रहता है, परन्तु बिना कुछ किये। लोग अंगराज कर्ण की भाँति 'गुदड़ी का लाल' कहलाना चाहते हैं, परंतु ये नहीं देखना चाहते कि नदी में बहती हुई पिटारी से लेकर महायुद्ध महाभारत की आखिरी शाम तक वो सिर्फ कांटों पर चला। अपितु वो सुर्य-पुत्र था, परंतु संघर्षों के बादल ने कभी उसे चमकने नहीं दिया। किसी को उसकी दानवीरता की भनक नहीं लगती, जिसे निबाहते-निबाहते उसे अपनी खाल समान कवच-कुंडल तक त्यागनी पड़ी। और उसके द्वारा प्रदर्शित मित्रता सचमुच दुर्लभ है।
इन सबसे इतर लोगों ने किसी और को अपना आदर्श बना लिया। लोगों ने आदर्श बनाया है, गंधार नरेश शकुनि को, जिसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था - हस्तिनापुर का नाश। और शायद उसी में उसकी संतुष्टि थी। वो कदापि दुर्योधन का समर्थक नहीं था। लोगों ने अनुकरण किया है दुर्योधन का, जो कि महत्वाकांक्षा के भूख में सब कुछ भूल बैठा। राजकुल का सम्मान, हस्तिनापुर का वैभव और कुरुवंश की साख। जन्मांध तो धृतराष्ट्र थे, परंतु सत्ता की ललक ने दुर्योधन को अंधा कर दिया। आज हमारे चारों ओर सत्ता के भूखे कइयों दुर्योधन, काले बादलों की भाँति मंडराते फिर रहे हैं। और दुस्सासन तो आपको हर गली-चौराहे पर मिल जाएगा , जो चीर-हरण के लिए सदैव तत्पर रहता है। आज के युग में कोई भी चौराहा कभी भी हस्तिनापुर का राजसभा बन जाता है, और कोई भी अबला द्रौपदी।
और आसपास खड़े लोग, मूक दर्शकों की भाँति निहारते रह जाते हैं। वो देखते हैं परंतु अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाते, क्योंकि उन्हें डर है, आज के कौरवों से। वो डरते हैं, क्योंकि आज कोई अर्जुन नहीं है, जो कौरवों का सामना कर सके।
तब के लोग अपने आपको धर्म और अधर्म के नाम पर पृथक कर लिए थे, तो गांगेय भीष्म और गुरू द्रोणाचार्य समान कुछ महात्माओं ने अपने कर्तव्यों के तले दबकर खुद
को अधर्म के साथ जोड़ा लिया। परंतु आज कर्तव्य तो किसी को याद नहीं, पर बांट लेते हैं खुद को राजनीतिक दलों के नाम पर। आज के शासक भी धर्मराज युधिष्ठिर जैसे प्रतापी और सत्यवादी नहीं हैं। वो गांगेय भीष्म समान प्रण तो लेते हैं, परंतु प्रण कभी पूर्ण नहीं कर पाते। आज शासक पहले जाति और धर्म के नाम पर अपना साम्राज्य विस्तार करते हैं, और जब राजनीतिक जंग जीतकर वो सत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ होते तो घोषणा करते हैं कि, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, इसलिए यहाँ जात-पात और धर्म के नाम पर बंटवारा नहीं होना चाहिए। और तब मासूम जनता हाथ मलकर यही सोचती रह जाती है कि ये तो फिर से उल्लू बना गया।
सचमुच तब के महाभारत का अंत तो एक युद्ध से हो गया था, परंतु आज का ये महाभारत कैसे रुकेगा? ढूंढना होगा हमें एक अर्जुन को, जो समस्त कौरवों को धूल चटा सके। ढूंढना होगा एक कृष्ण को,जो सही मार्गदर्शन दिखा सके।
हर हाल में इस महाभारत को रोकना जरूरी है। यदि ये नहीं रुका तो अपने गौरवशाली अतीत के बूते विश्व गुरु कहलाने वाला भारत अपने स्वाभिमान को जल्द ही खो देगा।
No comments:
Post a Comment