Sunday, 28 September 2014

हिन्दी को अर्पित...

हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।
तू अथाह सागर है खुद में,
एक बूंद भरने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

तू असीम शब्दों की दुनिया,
मैंने कुछ एक शब्द चुना है।
तेरे मोती चुन चुनकर के,
मैंने भी एक हार बुना है।
ये तेरे गले का कंठहार,
तुझको अर्पित करने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

माँ तेरे अनगिनत पुत्र ने,
कलम उठा, यश गान किया है।
तेरे आंचल में छिपकर के,
तेरा ही उत्थान किया है।
मैं भी तेरा एक पुत्र माँ,
तेरे अंक में आज मैं अर्पित,
'आत्म-कृति' करने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

- आनंद राज

Saturday, 27 September 2014

आत्म- कृति के बारे में …

सचमुच हमारे चारों ओर की दुनिया हम से कुछ कहती है, सजीवों और निर्जीवों से भरे इस अद्भुत प्रकृति में कइयों ऐसी चीजें हैं जो हमें अपनी ओर आकर्षित करती है। परन्तु जीवन के व्यस्त दिनचर्या में हमारे पास पर्याप्त समय नहीं होता कि हम उसे सुन पायें, फिर भी कभी-कभी जाने अनजाने में या अवकाश के क्षणों में हम उन चीजों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। हमारी भावनाएं जुड़ जाती है और तब चाह कर भी हम उन भावनाओं को छिपा नहीं पाते। फलस्वरूप वो भावनाएं मूक बनकर चित्र के रूप में, तो कभी वाचाल होकर कहानी अथवा कविता के रूप में उभर आती है ।

मेरी आत्म कृति ऐसी ही भावनाओं एवं संवेदनाओं का शाब्दिक रूपांतरण है।

मेरे शब्दों में ...

कभी कुएं की रस्सी,
कभी पेड़ से गिरते पत्ते।
कभी फूलों पे बैठीं तितली,
कभी मधुमक्खियों के छत्ते।
कभी रेत भरा मरुथल, तो
कभी नदी का किनारा।
देखा जिधर भी मैंने,
सबने मुझे पुकारा।

-आनंद राज 

लेखक - आत्म-कृति