Sunday, 28 September 2014

हिन्दी को अर्पित...

हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।
तू अथाह सागर है खुद में,
एक बूंद भरने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

तू असीम शब्दों की दुनिया,
मैंने कुछ एक शब्द चुना है।
तेरे मोती चुन चुनकर के,
मैंने भी एक हार बुना है।
ये तेरे गले का कंठहार,
तुझको अर्पित करने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

माँ तेरे अनगिनत पुत्र ने,
कलम उठा, यश गान किया है।
तेरे आंचल में छिपकर के,
तेरा ही उत्थान किया है।
मैं भी तेरा एक पुत्र माँ,
तेरे अंक में आज मैं अर्पित,
'आत्म-कृति' करने आया हूँ।
हिन्दी तेरी चरणों में मैं,
पुष्प भेंट करने आया हूँ।

- आनंद राज

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