Friday, 27 March 2015

दो आँखें तेरी

दो आँखें तेरी ,  दो  मेरी हो,
आ मिल के आँखें चार करें।
दुनिया को हो नफरत प्यारी ,
पर तुम तो मेरी  मोहब्बत हो।
इससे न कोई इनकार करे ,
दो आँखें तेरी ,  दो  मेरी हो,
आ मिल के आँखें चार करें। ......... २

दो तेरे कदम, दो मेरे  हो…
हमें राह-ए-मोहब्बत मिल जाए।
मैं दीवाना , तू दीवानी,
और, गुल-ए- मोहब्बत खिल जाए।
फिर धरती के इन रिश्तों पर,
ना आसमान इनकार करे।
दो आँखें तेरी ,  दो  मेरी हो,
आ मिल के आँखें चार करें।


दो बातें तेरी, दो मेरी  हो ,
मिल एक जुबां से कह जाए।
दास्तां इश्क़ ओ मोहब्बत की ,
न अनकही अधूरी रह जाए।
दो होंठ तेरे, दो मेरे  हों.…
कर एक, इश्क़ इज़हार करें।
दो आँखें तेरी ,  दो  मेरी हो,
आ मिल के आँखें चार करें।

Monday, 9 March 2015

Culfest'15

जरा नजरें उठा कर देख ले , चहुँओर  की झांकी.
गुजर होली गयी, मेरी झोली में कई रंग है बांकी .
दिखाऊंगा तुझे रंगीन है कितनी मेरी दुनिया .
तेरे जीवन में फिर से रंग भरने आ गया हूँ मैं .

रंग दो जहां को जिस भी रंग में रंगने को जी चाहे.
चलो, दो कदम उस राह, जिसपे चलने को जी चाहे.
हरेक प्रतिभाओं का आधार बनने आ गया हूँ मैं.
तेरी आवाज में हुंकार भरने आ गया हूँ मैं.

तेरे अंदर की चिंगारी को अब शोला बनाना है .
कला तेरे जो अंदर है, जहां को वो दिखाना है. 
तुम्हे संग ले , तेरे जलवे दिखने आ गया हूँ मैं.
तुम्हे फिर मंच पर वापस बुलाने आ गया हूँ मैं.

डफली की धुन पे जब तुम्हारा नाद हो पंचम,
तेरी आवाज को महसूस  करता जब  हो ये सरगम .
तेरे स्वर में , मेरी संगीत भरने आ गया हूँ मैं .
तुम्हें  पर्दों के अब इस पार करने आ गया हूँ मैं .


थिरक लेना तुझे तबलों की जब भी धुन सुनाई दे.
कभी यादों में खो जाना, कि जब बचपन दिखाई दे.
दशक नब्बे की हर यादें संजोकर आ गया हूँ मैं .
तुम्हें फिर से तेरा बचपन दिखने आ गया हूँ मैं.
-आनंद राज  

Thursday, 5 March 2015

HAPPY HOLI


हाथ में गुलाल लेके,
रंग पीला लाल लेके,
पुए भरे थाल लेके,
झूमते से चाल लेके।
बोलो मेरे संग यार होली है।

होली के हुड़दंग में तू,
गा ले आज संग में तू,
ताल से जब ताल मिले,
थिरकने दे अंग को तू ,
ढोलकों की ताल संग ले,
टोलियों की चाल संग ले
बोल मेरे संग यार होली है।



Wednesday, 28 January 2015

अपनी जान की असली कीमत , जिसने हमको समझाया ,
'आज़ाद-हिन्द' का परचम जिसने, विश्व-पटल पर लहराया
हुआ समर्पित राष्ट्र-प्रेम में , लगा दिया जिसने जीवन ,
मातृभूमि के उष सुभाष को, मेरा शत शत बार नमन 

इतनी काली काया लेकर, क्यों स्वच्छ बने फिरते हो तुम?

इतनी  काली काया लेकर,
क्यों स्वच्छ बने फिरते हो तुम?

खुद को भगवान बताते हो,
तुम आत्मसिद्धि पा लेते हो,
फिर झूठी  झूठी  बातें कहकर,
क्यों लोगों को झुठलाते हो?

है वस्त्र भले ही श्वेत तेरा,
पर स्वच्छ कहाँ जीवन में हो।
है पाँच सितारी ठाट बाट,
और कलुषित अंतरमन से हो।

'आशा' विहीन एक नर हो तुम,
है 'राम' नाम की ढ़ोंग तेरी।
'बापु' कहलाये जाते हो,
है हवसी,पापी सी नियत तेरी।

क्यों ईश्वर को ही ढ़ाल बना,
तुम काम घिनौने करते हो?
जिस नाम सहारे पेट पले,
शर्मसार उसे ही करते हो।

तेरा  अपना असली स्वरूप,
बरबस ही बाहर आया है।
काल कोठरी ने तुझको,
आखिरकार गले लगाया है।


आनंद राज