Saturday, 16 October 2021

यादों की रेलगाड़ी


 काफ़ी दिनों बाद ट्रेन में बैठा हूँ। वैसे तो इस अंतराल के बहुत से कारण हैं लेकिन जो सबसे ख़ास दो कारण हैं वो ये हैं कि एक तो हमारा घर बिहार के उस हिस्से में है जहां से नज़दीकी रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए कम से कम 25-30 किलोमीटर का सफ़र लोकल बस के सहारे तय करना पड़ता है और दूसरी वजह ये कि बिहार में ट्रेन इंतज़ार बहुत करवाती है। पहले पहली बात पर आते हैं। लगभग आधा दशक दिल्ली-गुड़गाँव में रहने के कारण ये 25-30 किलोमीटर का नज़रिया बदल गया है। अब मुझे 25-30 किलोमीटर के ट्रैवल का डर नहीं रहा वो तो हम 5 नए लोगों से मिलने और कुछ नए लोगों को सुनने कभी भी निकल जाते हैं, लेकिन ख़ौफ़ अगर कुछ है तो वो ये कि ये 25-30 किलोमीटर 2 घंटे में कौन तय करे।अब दूसरी बात पर अगर विचार करें तो सब कुछ सोचने-समझने के बाद यही निष्कर्ष निकलता है कि इंतज़ार ही करना है तो ट्रेन का क्यों करें? बेहतर है कि समय पर पहुँच कर मंज़िल का मज़ा लिया जाए। खैर ये मेरे अपने विचार हैं, मेरा भारतीय रेल से कोई वैमनस्यता अथवा निजी द्वेष नहीं है। 


बात भारतीय रेल की हुई है तो इस भारतीय रेल का बहुत क़र्ज़ है मेरे या यूँ कहें हमारे बचपन पर। बचपन के कुछ दिन जो नानीगाँव में गुजरा उसमें भारतीय रेल की कई यादें हैं। नाना जी का ‘कामत’ जिसे अमीरों के लहजे में फ़ार्म्हाउस कहा जाता है,  वीना-एकमा हॉल्ट से महज़ 800-900 मीटर की दूरी पर था लहजा ट्रेन कनेक्टिविटी ऑटो या ताँगा से भी बेहतर थी। हम समय जानने के लिए घड़ी पर कम और ट्रेन पर ज़्यादा नज़र रखते थे। ट्रेन की सिटी बजते ही पटरी से 20 मीटर की दूरी पर खड़े हो जाते थे और जैसे ही ट्रेन गुजरती थी, खिड़की के सामने बैठे लोगों को देखकर हाथ हिलाते। ये उम्मीद नहीं होती थी की कोई सामने से हाथ हिलाके जवाब देगा बस अच्छा लगता था तो हाथ हिला देते थे। नियमित रूप से ट्रेन के डब्बे गिनना और बाद में साथ आए भाई-बहनों से पूछ कर गिनती कन्फ़र्म करना रोज़ का काम था। अगर किसी की गिनती कम रह गयी तो आड वन आउट कर के जिस नम्बर पर सहमति बन जाती थी उसे ही फ़ाइनल काउंट मान लेते थे। हमें किसी की गिनती पर संदेह नहीं था बस ये मान लेते थे कि जिसने कम गिना वो हाथ हिलने में ज़्यादा इन्वोल्व रहा होगा एंड वाइस-वेरसा। हम वाक़ई उतनी ही तल्लीनता से डब्बे गिनते थे जैसे अगला स्टेशन सुपौल में बैठा स्टेशनमास्टर हमारी गिनती के बाद ही ट्रेन को आगे जाने की अनुमति देगा। 


नानीगाँव की ट्रेन कनेक्टिविटी को मद्देनज़र रखते हुए जब भी अपने गाँव से नानी गाँव गये तो सफ़र का आख़िरी साथी ट्रेन होता था या जब भी लौटते थे तो सफ़र की शुरुआत ट्रेन के साथ ही होती थी। उन दिनों उस रूट में छोटी लाइन की ट्रेन चलती थी जो कि सुपौल, ललितग्राम, नरपतगंज, छातापुर जैसे लगभग 19-20 स्टेशनों से होते हुए फारबिसगंज तक के 82-83 किलोमीटर का सफ़र लगभग 7-8 घंटे में तय करती थी। समय का अभाव था नहीं ज़िंदगी में तो सफ़र मज़ेदार ही हुआ करता था। ट्रेन में रास्ते भर मूँगफली खाते और दोनों भाई आपस में लड़ते हुए गुज़ार दिया करते थे। और ऐसे सफ़र के फलस्वरूप ट्रेन के बारे में आंतरिक विचार यही हुआ करता था कि ट्रेन साइकिल से भी धीरे चलती है लेकिन हम सब ट्रेन से इसलिए आते-जाते हैं क्योंकि हमारे पास इतनी साइकिल नहीं है कि सब एक एक साइकिल लेकर गाँव से नानीगाँव पहुँच सकें। साइकिल से एक और बात याद आती है वो ये कि दोनों भाई लड़कर एक खिड़की वाली सीट हासिल करते थे और उस पर ये बँटवारा होता था कि आधे रास्ते वो बैठेगा और बाक़ी के रास्ते हम। और इसी बँटवारे के बीच नुक़सान तब होता था जब कोई भलेमानुस अपनी साइकिल हमारी खिड़की के सामने टाँग कर ये ज़िम्मेदारी दे देते थे कि देखते रहना। ट्रेन की खिड़की तो ऐसे ही ४ लोहे की छड़ लिए बाहर के नज़ारे को अवरुद्ध करती थी ऊपर से सामने साइकिल का टायर और स्पोक। मतलब लड़-पिट के खिड़की वाला सीट हासिल करने की मेहनत बर्बाद…! 


इतने के बावजूद बचपन में ट्रेन के लिए कभी इज़्ज़त कम नहीं हुई। जब भी अपने गाँव पहुँचते थे तो हमउम्र बच्चों को ट्रेन की कहानियाँ सुनाते थे और वो सब बड़े चाव से सुनते भी थे क्योंकि उनमें से बहुत कम के नानी-गाँव के रास्ते में ट्रेन मिलता था। सबसे ज़्यादा मज़ा सबको ये बताते हुए आता था कि पता है ट्रेन में बैठने पर आसपास का पेड़ भी साथ में चलता है। कोई पूछता था कि कहाँ तक साथ चलता है? जवाब ये देते थे कि एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक। फिर नया पेड़ साथ आ जाता है। वाक़ई ट्रेन में सफ़र करते हुए हमने कितने पेड़ों को अपने साथ चलते हुए देखा। ३-४ बार उस रास्ते से आने-जाने के बाद तो हम पेड़ और इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन टावर को पहचानने लगे थे। ये पेड़ यहाँ से यहाँ तक खिड़की से दिखेगा और दूसरा वाला यहाँ से यहाँ तक। 


आज फिर से खिड़की के सामने बैठा हुआ बीते दिनों को याद करते हुए ये लिख रहा हूँ। साथ में हंस भी है वो बिना किसी प्रतिकार के बीच की सीट पर बैठा है।यूँ तो दोनों के लिए रेज़र्वेशन विंडो सीट की ही थी लेकिन ये गलती भारतीय रेल की है जिसने बुकिंग में कुछ और वादा किया और हक़ीक़त में कुछ और पकड़ा दिया। खैर रेल मंत्रालय के लिए काम करते हुए हंस के मन में भारतीय रेल के लिए सहानुभूति जायज़ है। 


बाक़ी बचपन में चलती ट्रेन की आवाज़ छुक-छुक सुनाई देती थी जो अब नहीं देती है। बड़ी लाइन और लम्बी दूरी की ट्रेन है तो किसी ने साइकल भी नहीं लटकाया। पेड़ अब भी दिख रहा है लेकिन दिमाग़ में मौजूद फ़िज़िक्स उसे साथ चलने से रोक रहा है।


- रीतेय #reetey

Saturday, 7 August 2021

इंडिया दैट इज़ भारत




बढ़ियाँ है गुरु, लगे रहिए!

नाम बदलना अपने आप में ख़तरनाक तरीक़ा है बदलाव लाने का। ऐसा कीजिए आप चाँदी और सोना का नाम बदल कर प्लैटिनम और प्लैटिनम प्रो कर दीजिए बाक़ी प्लैटिनम को प्लैटिनम प्रो मैक्स। 

अब आपको लगेगा की इससे फ़ायदा क्या होगा?  तो गुरु इससे फ़ायदा ये होगा की हिंदुस्तान में तीन तरह का प्लैटिनम हो जाएगा। 

आप फिर पूछोगे की चाँदी और सोना के साथ क्या होगा? तो गुरु उसका इलाज ये होगा की आप डीज़ल और पेट्रोल का नाम बदल कर क्रमशः चाँदी और सोना कर देना। इससे सोने और चाँदी सस्ते हो जाएँगे और एक्स्पनेंसियल  ग्रोथ वाला डीज़ल और पेट्रोल खबर से ऐसे ग़ायब हो जाएँगे जैसे ५०० और १००० के पुराने नोट।और इसके बाद जो होगा वो होगा इस बदलाव का मास्टर्स्ट्रोक , मतलब इस बदलाव के फ़ायदे, जो कि पिछले १० सालों से सवा सौ करोड़ की आबादी पर ठहरी हुई देश की जनता को कुछ इस तरह गिनवा देना -  

-  भाइयो-बहनो, आज से हिंदुस्तान ने एक नयी टेक्नॉलजी का ईज़ाद किया है। हमारे मुल्क की तमाम डीज़ल और पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियाँ अब क्रमशः चाँदी और सोने पर चलेंगी। घबराइए मत, ये नया ईंधन आपकी पुरानी गाड़ियों को बेकार नहीं होने देगा बस थोड़ी अप्ग्रेडेसन की आवश्यकता होगी । और इसकी प्रक्रिया ठीक वैसी होगी जैसा की आपने आपने ५०० और १००० के नोट को २००० में बदलते वक्त किया था। 

-  भाइयो-बहनो, धैर्य रखिए। हमने आपकी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस नए प्रकार के इंधन को काफ़ी कम क़ीमत पर उपलब्ध करवाने का निश्चय किया है। इसे आप पूर्ववर्ती डीज़ल और पेट्रोल के मात्र दोगुने मूल्य पर नज़दीकी रिलायंस सोना-चाँदी पम्प से ख़रीद पाएँगे।

-  एक और ख़ास बात, हमने नज़दीकी सोना-चाँदी पम्प तक जाने के लिए नया राजमार्ग का भी निर्माण किया है ।अब आपको रिलायंस सोना-चाँदी पम्प तक जाने के लिए औरंगज़ेब मार्ग के बजाय कलाम मार्ग पर चलना पड़ेगा। औरंगज़ेब मार्ग हमने तत्काल प्रभाव से मुग़लों को वापस लौटा दिया।

-  और हाँ अब आप सोच रहे होंगे कि आपके पास जो पहले से सोना चाँदी पड़ा है उसका क्या होगा? सोच रहे हैं कि नहीं सोच रहे हैं ? तो भाइयो-बहनो , ये सोना-चाँदी आपकी तिजोरी में पड़ी सोने-चाँदी से बिल्कुल अलग है। आपकी तिजोरी में पड़े-पड़े तमाम सोना-चाँदी अब बेकार हो गए हैं, उसे हमारे नज़दीकी 'डू आई केयर' बैंक लॉकर में जमा कराएँ और बदले में आधे वज़न का ‘प्लैटिनम’ और ‘प्लैटिनम प्रो’ ले जाएँ। आपकी सुविधा के लिए हमने इसका रंग-रूप चाँदी और सोना के तरह ही रखा है लेकिन ये पहले वाले से अलग है। ये नया इंडिया का प्लैटिनम है। रीनेम्ड एंड  रेकग्नायज़्ड बाई इंडिया ओन्ली।

मेरे देशवासियो, अगर आपको ये मज़ाक़ लग रहा है तो ये मज़ाक़ आपके साथ बहुत पहले से चल रहा है। और इसी तरह  चलता रहा तो आने वाले कुछ सालों में देश से ग़रीबी, लाचारी और बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ  ख़त्म हो जाएँगी । देश में सिर्फ़ दो तरह के लोग बचेंगे और खबर ये आएगा की हिंदुस्तान में अब कोई गरीब, बेबस, लाचार  और बेरोज़गार नहीं बचा। नया इंडिया में २० फ़ीसदी लोग अमीर हैं और ८० फ़ीसदी आत्मनिर्भर!


-  रीतेय  #Reetey



Friday, 6 August 2021

क्रिकेट : ग्राउंड से गाँव तक

 आजकल सोशल मीडिया पर क्रिकेट के लिए अजीब सा विरोधाभास का माहौल बना हुआ है। ऐसा लग रहा है मानो क्रिकेट ने जबरन बाक़ी खेलों का जगह ले लिया हो। हम कभी नहीं सोचते कि क्रिकेट में इतने समर्थक, इतना स्टार्डम, इतना पैसा कहाँ से आया? 


ज़्यादा नहीं अगर तीन दशक पीछे जाकर देखें तो १९९२ में क्रिकेट मैच के प्रसारण के लिए दूरदर्शन ने बी॰सी॰सी॰आई॰ से ५ लाख रुपय माँगा था और लगभग २० साल बाद उसी बी॰सी॰सी॰आई॰ ने किसी दूसरे निजी चैनल को अगले ६ साल का प्रसारण प्राधिकरण लगभग ४ हज़ार करोड़ में बेचा? 

मैं सोचता हूँ कि इतने कम समय में इतना कुछ कैसे बदल गया? कहाँ से आए इतने समर्थक? क्यों होता गया क्रिकेट इतना दिलचस्प? ऐसा भी नहीं है कि क्रिकेट की टीम लगातार सर्वश्रेष्ठ स्तर पर खेलती रही या फिर कभी कोई कांट्रवर्सी नहीं हुई। सदी के शुरुआत में ही क्रिकेट में फ़िक्सिंग का घटना सामने आया। २००३ में फ़ाइनल खेलने वाली टीम २००७ में लीग मैच में ही अपने से निम्नस्तरीय टीम से हार कर बाहर हो गयी। 

जितना मैं क्रिकेट को समझ पाया हूँ, इसे इतना जीवंत बनाने में इनके खिलाड़ियों से कहीं ज़्यादा योगदान इस खेल का अपना एक अलग स्वरूप से है। बाक़ी खेलों के अपेक्षा क्रिकेट कहीं ज़्यादा कस्टमाईजेबल और ऐक्सेसिबल है। और यही कस्टमाईजेबिलिटी तथा ऐक्सेसिबिलिटी इसे हिंदुस्तान में ईडन गार्डेन से सुदूर गाँव की गलियों तक पहुँचाने में क़ामयाब रहा है।अधिकारिक तौर पर २२ खिलाड़ियों और दो अम्पायअर के साथ साथ प्रॉपर ग्राउंड और बल्लेबाज़ों और गेंदबाज़ों के लिए प्रॉपर किट के साथ खेला जाने वाला यह खेल अपने हर आयाम में कस्टमायज़ होने के लिए तैयार है।

आपके पास २२ लोग नहीं है तो टीम का साइज़ कम कर लीजिए। और टीम साइज़ ४-५ लोगों तक कम किया जा सकता है.. मतलब जितने भी लोग जमा हो उनको बराबर-बराबर बाँट के टीम बन सकती है। अगर लोग विषम संख्या में हो तो बाक़ी बचे को या तो अम्पायअर बना दीजिए या फिर दोनों तरफ़ से खेलने की सहमती दे दीजिए। अगर उतना भी ना हो एक बल्लेबाज़, एक गेंदबाज़ भी काफ़ी है ५-५ ओवर बैटिंग-बॉलिंग करने के लिए। 

६ विकेट नहीं हैं तो ६ डंडे ढूँढ लीजिए, वो भी ना मिले तो १५-१६ ईंट भी काम आ जाएग और अगर वो भी जुगाड़ नहीं हो पा रहा हो तो एक कमर भर ऊँची दीवार पर लक़ीर खींच कर बना दीजिए  विकेट और दूसरे तरफ़ ४-५ चप्पल भी रख देंगे तो नॉन-स्ट्राइक एंड का विकेट तो बन ही जाएगा। वैसे भी दीवारों पर विकेट बन जाने से एक फ़ायदा ये होता है की विकेट कीपिंग और थर्ड-मैन वाला पूरा काम बच जाता है।

बड़ा मैदान नहीं है तो छोटा मैदान ढूँढ लीजिए। वो भी नहीं मिले तो बस इतनी जगह खोज लीजिए जहाँ एक छोर से बल्लेबाज़ी और एक तरफ़ से गेंदबाज़ी हो सके तथा ऑन या ऑफ़ किसी भी साइड चौका लगने लायक़ जगह हो। जगह और कम हो तो वन-टिप वन हैंड भी चलेगा। ऑन या ऑफ़ साइड का रन रखना है या नहीं इसपर भी आपसी सामंजस्य से निर्णय लिया जा सकता है। मतलब क्रिकेट का खेल, क्रिकेट ग्राउंड के साथ-साथ अमूमन किसी भी मैदान पार खेला जा सकता है। यहाँ तक कि बैस्कट्बॉल कोर्ट पर वन-टिप-वन-हैंड वो भी हार्ड-प्लास्टिक बॉल के साथ एक अलग तरह का कॉम्बिनेशन है।

प्रॉपर क्रिकेटिंग किट ना हो तो ड्यूज़ के जगह टेनिस बॉल से खेल लीजिए, टेनिस बॉल ना हो तो प्लास्टिक बॉल भी चलेगा। बैट ना हो तो ढूँढिए कोई तुलनात्मक आकार का लड़की का टुकड़ा और थोड़ी मेहनत लगाकर हैंडल बनाइए.. शॉट मारने पर थोड़ी झनझनाहट होगी हाथों में लेकिन आप क्रिकेट तो खेल ही सकते हैं।

बात अगर समय की करें तो  ज़्यादा समय हो तो ५ या ३ दिन का टेस्ट मैच खेल लीजिए और ना हो तो ५० के जगह २५ ओवर, वो भी ना हो तो २०, १५, १०, ५ जितने ओवर के खेल पर दोनों टीमों की सहमती बने उतने का खेल लीजिए। 

कहने का तात्पर्य यह है कि क्रिकेट का नियम आपको क्रिकेट खेलने से कभी नहीं रोकेगा। ना  ही टीम साइज़ और ना ही ग्राउंड साइज़ कभी बाधा बनेगी। लंदन के लॉर्ड्स से लखीमपुर की गलियों तक अगर खेलनेवालों का मन है तो क्रिकेट का खेल हो जाएगा। और जब तक खेल होता रहेगा लोग जुड़े रहेंगे। लोग जुड़े रहेंगे तो खिलाड़ी, समर्थक, दर्शक, आलोचक, विश्लेषक या क्रिकेट से जुड़ा जो बन सकते हैं बनते रहेंगे।

-रीतेय