काफ़ी दिनों बाद ट्रेन में बैठा हूँ। वैसे तो इस अंतराल के बहुत से कारण हैं लेकिन जो सबसे ख़ास दो कारण हैं वो ये हैं कि एक तो हमारा घर बिहार के उस हिस्से में है जहां से नज़दीकी रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए कम से कम 25-30 किलोमीटर का सफ़र लोकल बस के सहारे तय करना पड़ता है और दूसरी वजह ये कि बिहार में ट्रेन इंतज़ार बहुत करवाती है। पहले पहली बात पर आते हैं। लगभग आधा दशक दिल्ली-गुड़गाँव में रहने के कारण ये 25-30 किलोमीटर का नज़रिया बदल गया है। अब मुझे 25-30 किलोमीटर के ट्रैवल का डर नहीं रहा वो तो हम 5 नए लोगों से मिलने और कुछ नए लोगों को सुनने कभी भी निकल जाते हैं, लेकिन ख़ौफ़ अगर कुछ है तो वो ये कि ये 25-30 किलोमीटर 2 घंटे में कौन तय करे।अब दूसरी बात पर अगर विचार करें तो सब कुछ सोचने-समझने के बाद यही निष्कर्ष निकलता है कि इंतज़ार ही करना है तो ट्रेन का क्यों करें? बेहतर है कि समय पर पहुँच कर मंज़िल का मज़ा लिया जाए। खैर ये मेरे अपने विचार हैं, मेरा भारतीय रेल से कोई वैमनस्यता अथवा निजी द्वेष नहीं है।
बात भारतीय रेल की हुई है तो इस भारतीय रेल का बहुत क़र्ज़ है मेरे या यूँ कहें हमारे बचपन पर। बचपन के कुछ दिन जो नानीगाँव में गुजरा उसमें भारतीय रेल की कई यादें हैं। नाना जी का ‘कामत’ जिसे अमीरों के लहजे में फ़ार्म्हाउस कहा जाता है, वीना-एकमा हॉल्ट से महज़ 800-900 मीटर की दूरी पर था लहजा ट्रेन कनेक्टिविटी ऑटो या ताँगा से भी बेहतर थी। हम समय जानने के लिए घड़ी पर कम और ट्रेन पर ज़्यादा नज़र रखते थे। ट्रेन की सिटी बजते ही पटरी से 20 मीटर की दूरी पर खड़े हो जाते थे और जैसे ही ट्रेन गुजरती थी, खिड़की के सामने बैठे लोगों को देखकर हाथ हिलाते। ये उम्मीद नहीं होती थी की कोई सामने से हाथ हिलाके जवाब देगा बस अच्छा लगता था तो हाथ हिला देते थे। नियमित रूप से ट्रेन के डब्बे गिनना और बाद में साथ आए भाई-बहनों से पूछ कर गिनती कन्फ़र्म करना रोज़ का काम था। अगर किसी की गिनती कम रह गयी तो आड वन आउट कर के जिस नम्बर पर सहमति बन जाती थी उसे ही फ़ाइनल काउंट मान लेते थे। हमें किसी की गिनती पर संदेह नहीं था बस ये मान लेते थे कि जिसने कम गिना वो हाथ हिलने में ज़्यादा इन्वोल्व रहा होगा एंड वाइस-वेरसा। हम वाक़ई उतनी ही तल्लीनता से डब्बे गिनते थे जैसे अगला स्टेशन सुपौल में बैठा स्टेशनमास्टर हमारी गिनती के बाद ही ट्रेन को आगे जाने की अनुमति देगा।
नानीगाँव की ट्रेन कनेक्टिविटी को मद्देनज़र रखते हुए जब भी अपने गाँव से नानी गाँव गये तो सफ़र का आख़िरी साथी ट्रेन होता था या जब भी लौटते थे तो सफ़र की शुरुआत ट्रेन के साथ ही होती थी। उन दिनों उस रूट में छोटी लाइन की ट्रेन चलती थी जो कि सुपौल, ललितग्राम, नरपतगंज, छातापुर जैसे लगभग 19-20 स्टेशनों से होते हुए फारबिसगंज तक के 82-83 किलोमीटर का सफ़र लगभग 7-8 घंटे में तय करती थी। समय का अभाव था नहीं ज़िंदगी में तो सफ़र मज़ेदार ही हुआ करता था। ट्रेन में रास्ते भर मूँगफली खाते और दोनों भाई आपस में लड़ते हुए गुज़ार दिया करते थे। और ऐसे सफ़र के फलस्वरूप ट्रेन के बारे में आंतरिक विचार यही हुआ करता था कि ट्रेन साइकिल से भी धीरे चलती है लेकिन हम सब ट्रेन से इसलिए आते-जाते हैं क्योंकि हमारे पास इतनी साइकिल नहीं है कि सब एक एक साइकिल लेकर गाँव से नानीगाँव पहुँच सकें। साइकिल से एक और बात याद आती है वो ये कि दोनों भाई लड़कर एक खिड़की वाली सीट हासिल करते थे और उस पर ये बँटवारा होता था कि आधे रास्ते वो बैठेगा और बाक़ी के रास्ते हम। और इसी बँटवारे के बीच नुक़सान तब होता था जब कोई भलेमानुस अपनी साइकिल हमारी खिड़की के सामने टाँग कर ये ज़िम्मेदारी दे देते थे कि देखते रहना। ट्रेन की खिड़की तो ऐसे ही ४ लोहे की छड़ लिए बाहर के नज़ारे को अवरुद्ध करती थी ऊपर से सामने साइकिल का टायर और स्पोक। मतलब लड़-पिट के खिड़की वाला सीट हासिल करने की मेहनत बर्बाद…!
इतने के बावजूद बचपन में ट्रेन के लिए कभी इज़्ज़त कम नहीं हुई। जब भी अपने गाँव पहुँचते थे तो हमउम्र बच्चों को ट्रेन की कहानियाँ सुनाते थे और वो सब बड़े चाव से सुनते भी थे क्योंकि उनमें से बहुत कम के नानी-गाँव के रास्ते में ट्रेन मिलता था। सबसे ज़्यादा मज़ा सबको ये बताते हुए आता था कि पता है ट्रेन में बैठने पर आसपास का पेड़ भी साथ में चलता है। कोई पूछता था कि कहाँ तक साथ चलता है? जवाब ये देते थे कि एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक। फिर नया पेड़ साथ आ जाता है। वाक़ई ट्रेन में सफ़र करते हुए हमने कितने पेड़ों को अपने साथ चलते हुए देखा। ३-४ बार उस रास्ते से आने-जाने के बाद तो हम पेड़ और इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन टावर को पहचानने लगे थे। ये पेड़ यहाँ से यहाँ तक खिड़की से दिखेगा और दूसरा वाला यहाँ से यहाँ तक।
आज फिर से खिड़की के सामने बैठा हुआ बीते दिनों को याद करते हुए ये लिख रहा हूँ। साथ में हंस भी है वो बिना किसी प्रतिकार के बीच की सीट पर बैठा है।यूँ तो दोनों के लिए रेज़र्वेशन विंडो सीट की ही थी लेकिन ये गलती भारतीय रेल की है जिसने बुकिंग में कुछ और वादा किया और हक़ीक़त में कुछ और पकड़ा दिया। खैर रेल मंत्रालय के लिए काम करते हुए हंस के मन में भारतीय रेल के लिए सहानुभूति जायज़ है।
बाक़ी बचपन में चलती ट्रेन की आवाज़ छुक-छुक सुनाई देती थी जो अब नहीं देती है। बड़ी लाइन और लम्बी दूरी की ट्रेन है तो किसी ने साइकल भी नहीं लटकाया। पेड़ अब भी दिख रहा है लेकिन दिमाग़ में मौजूद फ़िज़िक्स उसे साथ चलने से रोक रहा है।
- रीतेय #reetey

No comments:
Post a Comment