7 जुलाई 1964
आज़ाद भारत को लगभग 17 साल हो चुका है। एक लड़का जो अभी-अभी शायद ग्रैजूएशन में दाख़िला लिया है और उसी दुनिया के किसी दूसरे कोने में एक लड़की अपनी हाई-स्कूल की पढ़ाई पूरी कर चुकी है।
लड़का बिहार प्रांत के पूर्णिया ज़िला के किसी गाँव का निवासी है। गाँव जिसकी पहचान यही है कि वह कोसी नदी से कोस भर दूर है। लड़का अपने गाँव में कम और गाँव से बाहर ज़्यादा रहा है और शायद यही वजह है कि पढ़-लिख गया है। परिवार बहुत खुशहाल नहीं है। ग़रीबी है और उसे दूर करने की जद्दोजहद जारी है।
बात लड़की की करें तो वो एक संपन्न परिवार से आती है। पिताजी अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं। लड़की अपने माँ और भाई-बहनों के साथ भागलपुर ज़िला के रंगरा गाँव में रहती है। माँ-बाबूजी शिक्षा की महत्व को बखूबी समझने वाले लोग हैं शायद इसलिए लड़की हाई-स्कूल तक की पढ़ाई पूरी कर पायी है।
दोनों परिवारों की तुलना की जाए तो बिहार के मानचित्र पर जितनी दूरी इन दोनों गाँव के बीच है, उससे कहीं ज़्यादा दूरी इन दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति में है। पर वो कहते हैं ना कि शादी-ब्याह के रिश्ते हम नहीं बनाते, रब बना कर भेजता है। कुछ ऐसा ही हुआ इन दोनों के साथ भी। शायद लड़की के पिताजी ने लड़के की आर्थिक स्थिति से ज़्यादा उसके बौद्धिक क्षमता को परखा होगा। क्योंकि सही मायने में सिवाय बौद्धिक क्षमता के और कुछ था भी नहीं लड़के के पास। परिवारों के बीच बात-चीत शुरू हुई, बात आगे बढ़ी और ७ जुलाई १९६४ को दोनों हमेशा के लिए परिणय सूत्र में बंध गए।
शादी हुई और कुछ समय बाद लड़की मायके से ससुराल आ गयी। यह अवस्थांतर लड़की के लिए ज़्यादा मुश्किल है। मुश्किल इसलिए नहीं कि इसमें वैवाहिक बंधन की कठोरता है, मुश्किल इसलिए की वो जिस घर में आयी है वो शाब्दिक अर्थ में भी बस एक घर ही है। एक छप्पर जिसमें आने जाने के रास्ते तो हैं पर दरवाज़ा नहीं है। मायके से साथ लाए सामान तो है पर महफ़ूज़ रखने तक की जगह नहीं है। सोने के लिए बिस्तर है पर चारपाई नहीं है। वाक़ई लड़की के लिए ये सफ़र एक मकान से झोपड़ी तक का है। ज़िंदगी में संघर्ष नहीं है.. संघर्षों के बीच ज़िंदगी तलाश की जा रही है। पर दूसरी दृष्टि से देखें तो ये एक मौक़ा है एक नयी शुरुआत का। और आगे चलकर यही हुआ भी।
लड़का अपने गाँव में कम और ननिहाल में ज़्यादा रहता है। वज़ह ये कि शिक्षा के दृष्टिकोण से लड़के का ननिहाल समृद्ध है। वहाँ उसके कुछ होनहार दोस्त हैं जिसके साथ मिलकर वो कुछ बच्चों को पढ़ा-लिखाकर जीवन-यापन के लायक़ कुछ कमा लेता है। कमाई के कुछ पैसे उसकी अपनी पढ़ाई चलती है और बाक़ी के बचे पैसों से घर, खेती-बाड़ी। ये संघर्ष लगभग अगले एक दशक तक चलता रहता है। इस दौरान परिवार दो से बढ़कर पाँच का हो जाता है। बड़ा बेटा अब लगभग आठ साल का है और छोटा बेटा अभी गोद में है। दोनों भाइयों के बीच एक बहन है जो लगभग चार-पाँच साल की है।
भारत अब आज़ादी से तीसरे दशक में प्रवेश करने वाला है और शिक्षा की महत्ता केंद्र के साथ साथ राज्य सरकार भी समझने लगी है। ये वो समय है जब प्रांत में जगह-जगह विद्यालयों की स्थापना हो रही है। प्रांत भर में हो रहे इस बदलाव का असर लड़के की ज़िंदगी पर भी पड़ती है। लड़का ननिहाल में अपने दोस्तों से साथ जहाँ बच्चों को पढ़ाया लिखाया करता था वो एक अस्थायी कोचिंग के जगह राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत उच्च विद्यालय में परिवर्तित होने जा रहा है। ये क्षण सचमुच एक गौरव का क्षण है।
ज़िंदगी की रेलगाड़ी मेहनत और लगन के साथ बढ़ते हुए पटरी पर लौट रही है। घर में नियमित पैसे आने शुरू हो गये हैं और परिवार भी अब दो से बढ़कर छः लोगों का हो गया है। बड़ा बेटा अब लगभग बारह साल का है और अपनी छोटी बहन के इस दुनिया में आने पर बहुत ख़ुश भी है। लड़का ग्रीष्मावकाश में घर लौटा है और दोनों ने मिलकर ये फ़ैसला किया है कि दोनों बड़े बच्चे अब माँ की ममता से दूर पिता के छत्रछाया में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे। नए सत्र के आरंभ से छः का परिवार तीन-तीन में बँट गया है।
वक़्त का पहिया अपने रफ़्तार से आगे बढ़ता जा रहा है। बच्चे बड़े हो रहे हैं। लड़की गाँव में दोनों छोटे बच्चों के साथ घर-गृहस्थी सम्भाल रही है। देखा जाए तो ज़िम्मेदारियों का एक बड़ा हिस्सा लड़के के बजाय लड़की के ऊपर है और वो उसे बड़ी कुशलता से सम्भाल भी रही है। घर-गृहस्थी के साथ साथ दोनों बच्चों के प्राथमिक शिक्षा का भी बख़ूबी ध्यान रख रही है। लड़का अब ननिहाल के बजाय स्कूल के ही एक कमरे में अपने बेटे के साथ रहने लगा है और बेटी अपने पिता के ननिहाल में रहकर स्कूल जाती है।
लड़के की पढ़ाई के दिनों से लेकर आज तक की उसकी ज़िंदगी में एक ख़ास दोस्त का अहम योगदान रहा है। उसका वह दोस्त उसी स्कूल में गणित और विज्ञान का अध्यापक है। दोनों अपने जवानी के दिनों से साथ रहे हैं। नौकरी के लिए संघर्ष हो या फिर रंगमंच की अदाकारी, दोनों ने सब साथ-साथ किया है। देश में जब इमर्जेन्सी लगी तो दोनों साथ साथ जेल भी गये। लड़के के इस ख़ास दोस्त की पारिवारिक स्थिति भी एक जैसी है। वो भी बचपन से अपनी माँ के साथ ननिहाल में ही रहा है। अब शादी-शुदा है और दो बेटियाँ - तीन बेटे को मिलाकर कुल आठ जनों का परिवार है। दोनों की दोस्ती आगे बढ़ती ज़िंदगी के साथ और मज़बूत होती गयी है। दोनों परिवार कई मौक़ों पर मिलते रहे हैं। साल दर साल ज़िंदगी बेहतर होती जा रही है।
![]() |
| लड़का जवानी के दिनों में अपने दोस्त के साथ |
बीसवीं सदी अपने उपान्त्य दशक के अंत की ओर अग्रसर है। सावन का महीना है। लड़का अपने दोस्तों के साथ बाबा वैद्यनाथ धाम की यात्रा पर है। अभी टोली किसी जनवासा के समीप रुकी हुई है। लड़के के दोस्त के चेहरे पर हल्की सी शिकन है। बात-बात में ही उसकी चिंता ज़ाहिर होती है। उसे लग रहा है की उसकी छोटी पुत्री अब विवाह योग्य है अतः उसे योग्य लड़के की तलाश शुरू करनी चाहिए। सभी साथी निर्णय लेते हैं की यात्रा से लौटकर वो सब अपने स्तर से इसके बारे में सोचेंगे। इसी बीच कोई साथी लड़के से उसके बड़े बेटे के बारे में पूछता है और साथ ही एक सुझाव कि क्यों ना दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल लिया जाए? लड़के को सुझाव अच्छा लगता है। वह अपने दोस्त से कहता है कि अगर उसे अपनी बेटी के लिए उसका का बड़ा बेटा योग्य लगता है इसके बारे में आगे सोचा जा सकता है। लड़के के दोस्त को भी यह सुझाव पसंद है। कुछ देर विश्राम करने के पश्चात सभी लोग पुनः अपनी यात्रा पर निकल पड़ते है। यात्रा से लौटते हुए दोनों दोस्त यह निर्णय लेते है कि अपने अपने घर लौटकर बच्चों की माताओं को भी इस प्रस्ताव में शामिल करेगा।
![]() |
| लड़की 80 के दशक में |
दोनों दोस्त अपने अपने घर लौटकर अपने अपने बच्चे की माताओं से विचार-विमर्श करता है। लड़की अपने बेटे की शादी कि बात सुनकर ख़ुश है परंतु वह शादी के पहले होने वाली बहू से मिलना चाहती है । परिवारों का मेल-जोल के उपरांत बात आगे तक जाती है और दोस्ती रिश्तेदारी में बदल जाती है।
या बीसवीं सदी का आख़िरी दशक है। ये वो दौर है जब बिहार के सबसे पुराने ज़िले को काटकर दो और नए ज़िले का गठन हुआ है। दशक के पूर्वार्ध में पोते-पोतियों का आगमन हुआ है।बड़े बेटे की शादी के उपरांत बड़ी बेटी की भी शादी हो चुकी है। बड़ी बेटी का रिश्ता विद्यालय के ही प्राचार्य के बड़े बेटे से हुई है। परिवार ख़ुशहाल है। दशक के मध्य में लड़के का तबादला दूसरे शहर में हो जाता है। नया स्कूल प्रांत के कटिहार ज़िला में है। ये पहली बार नहीं है जब लड़के का ठिकाना घर से दूर रहा हो लेकिन इतनी दूर शायद पहली बार हुआ है। इस बार पिता को नए ठिकाने पर छोड़ने बड़ा बेटा आया है।
दशक का उत्तरार्ध बहुत अच्छा नहीं रहा। लड़के के तबादले के कुछ महीने बाद से बड़े बेटे की तबियत बहुत बेहतर नहीं है। RIMS से AIIMS तक इलाज चला लेकिन रोग असाध्य है। बीसवीं सदी अपने उपान्त्य वर्ष में है। लड़के का भतीजा उससे मिलने कटिहार आया है। यह एक आकस्मिक घटना है। खबर मिली है कि बड़े बेटे की स्थिति अब बहुत नाज़ुक है। लड़का घर लौट आया है। कुछ दिनों बात बड़ा बेटा अपनी सांसारिक ज़िम्मेदारी से हमेशा के लिए दूर चला जाता है। यह लड़के-लड़की की ज़िंदगी का कठिनतम दौर है।
लड़के को पुनः अपने काम पर लौटना है। छोटा बेटा अब 23-24 साल का है और पूर्णिया में रहकर अपनी पढ़ाई-लिखाई कर रहा है। छोटी बेटी अपनी माँ के साथ है। बड़ा पोता बचपन से दादी के ज़्यादा क़रीब रहा है। बहु मायके-ससुराल और तीनों बच्चों के बीच अपना मन और समय बाँट रही है। ये वो दौर है जहाँ लड़की के लिए सबसे बड़ी चुनौती है घर को सम्भाल कर रखना और वो इसमें लगातार कामयाब भी होती रही है। अब तक घर मुहल्ले के बीच हैं लेकिन आस-पड़ोस के माहौल बहुत अच्छा नहीं है
छोटा बेटा अब गाँव लौट आया है। उसके कंधे पर असमय बहुत बड़ी ज़िम्मेदारियों को बोझ आ गया है। उसने गाँव में अपना व्यवसाय शुरू किया है। लड़की ने आस-पड़ोस के माहौल को देखते हुए अपना घर मुहल्ले के दूसरे छोर पर विस्थापित करने का फ़ैसला किया है। ये वो दौर है जब समय तक रुका रुका सा लग रहा है। नया घर नया नहीं है अपितु एक पुराने जनवासे को किसी तरह रहने लायक़ बनाया गया है। अगले 2-3 सालों का बीतना एक दशक के बीतने जैसा रहा है। यह एक नयी सदी का आरम्भ है और ज़िंदगी के कुछ पहलुओं को नए सिरे से सोचने का भी।
तीनों पोते-पोतियाँ सहित परिवार में नियमित रूप से आठ लोग हैं। तीनों बच्चे अभी दादी और बुआ के संरक्षण में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। गाँव की शिक्षा व्यवस्था अभी भी बहुत बेहतर नहीं है परंतु हाल के दिनों में एक निजी कोचिंग संस्थान की स्थापना हुई है। मुहल्ले के ज़्यादातर बच्चे अब वही पढ़ने जा रहे हैं। साल डेढ़ साल तक तीनों बच्चे भी वहीं पढ़ते हैं फिर आगे की पढ़ाई के लिए अपने मामा के संरक्षण में सहरसा चले जाते हैं। इसी बीच लड़के ने कुछ पैसों का इंतज़ाम करके रहने लायक़ घर बनवाया है। नयी सदी का पहला 3 साल जैसे तैसे बीत चुका है।
छोटी बेटी के लिए रिश्ते खोजे जा रहे हैं और छोटे बेटे के लिए आनेवाले रिश्तों में से उपयुक्त रिश्ते का चयन भी। इन दोनों शादियों में भी लड़के के दोस्त जो कि अब समधी भी है, का योगदान महत्वपूर्ण है। लड़के का नया समधी अपने परिवार के साथ जमशेदपुर में रहता है। सदी के चौथे साल के दूसरे महीने में छोटी बेटी की शादी हो जाती है और शादी के कुछ दिनों बाद छोटी बेटी अपने ससुराल चली जाती है। उसी साल जून में छोटे बेटे की भी शादी हो जाती है और साल भर बाद छोटी बहू घर आ जाती है। परिवार एक बार फिर से ख़ुशहाली की ओर बढ़ने को प्रयासरत है।
ये वो दौर है जब बिहार की राजनीति बदल रही है। लोगों को लालटेन की रोशनी फीकी लगने लगी है। इसी बीच अपने मामा के संरक्षण में पढ़ते हुए पोती और बड़ा पोता का चयन नवोदय विद्यालय में हो जाता है। बिहार में सत्ता परिवर्तन हुआ है और नए मुख्यमंत्री ने रोज़गारी बढ़ाने के किए नए-नए शिक्षा-मित्रों को बहाल किया है। कुछ समय पहले सरकार ने वर्तमान शिक्षक के तबादले का भी एलान किया जिसके फलस्वरूप लड़के को पुनः अपने पुराने स्कूल लौटना पड़ा है। लड़के का दोस्त अब तक सेवानिवृत्त हो चुका है और लड़के की 2-3 साल की नौकरी शेष है। अगले कुछ सालों के लिए लड़का का ठिकाना उसके दोस्त का घर है।
नयी सदी के पहले दशक का उत्तरार्ध कुछ और अनुकूल बदलाव लेकर आया है। परिवार में 4 और नए मेहमान जुड़ गए हैं। तीन पोतियाँ और एक पोते सहित अब घर में सात बच्चे हैं। अब लड़के-लड़की की तीसरी पीढ़ी पाँच नाती-नातिन सहित कुल बारह जनों की है। लड़के ने रेटायअर्मेंट में मिले पैसों से गाँव में एक पक्का मकान बनवा लिया है। पास के शहर में थोड़ी बहुत ज़मीन भी ख़रीद ली। इसी बीच बिहार ने भयानक बाढ़ की त्रासदी को भी झेला है। बड़े पोते-पोतियों ने दसवीं की परीक्षा पास कर ली है और आगे एंजिनीरिंग कॉलेज में दाख़िला के लिए पढ़ाई कर रहे हैं। बड़ी बहू ग्राम पंचायत में पहले पंच बनी फिर पंचायत सचिव। सेवा-निवृत्ति के बाद लड़के ने अपने आप को व्यस्त रखने के लिए अपना मन बाग़बानी में लगाना आरम्भ कर दिया है। लड़का अपने जवानी के दिनों से ही रेडीओ का शौक़ीन रहा है और हाल के दिनों में उसकी निर्भरता रेडीओ पर थोड़ी और बढ़ीहै। बाक़ी की तमाम पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ छोटे बेटे, और दोनों बहुओं पर है।परिवार पर कुछ छोटे मोटे संकट भी आए पर सबने एकजुट होकर सामना किया है।
यह नयी सदी का दूसरा दशक है। बड़ी पोती कोलकाता में और बड़ा पोता जमशेदपुर में रहकर एंजिनीरिंग की पढ़ाई कर रहा है। दूसरा पोता ने एंजिनीरिंग के बजाय जर्नलिज़म को चुना और अब दिल्ली में रहकर अपनी पढ़ाई कर रहा है। बाक़ी के चारों पोते-पोतियों की पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए पास के शहर वाली ज़मीन पर घर बनवाया गया है। लड़का-लड़की का साथ अब पाँच दशक का हो चुका है। बड़ी बहू अब गाँव के बजाय दो छोटे बच्चों के साथ पास के शहर वाले घर में रहने लगी है। दूसरे दशक के उत्तरार्ध आते-आते तीनों बड़े बच्चे अपने अपने क्षेत्र में अच्छी नौकरी करने लगे हैं। पोती मुंबई में और दोनों पोता दिल्ली में रहने लगा है। चारों छोटे बच्चे अपनी चाची के साथ रहकर पढ़ाई करने लगे हैं।
घर एक बार फिर से उत्सव मनाने को तैयार है। बड़ी पोती का रिश्ता तय हुआ है। होने वाला दामाद भी एंजिनीर है और दिल्ली में रहता है। घर ने पूरे धूमधाम से जश्न मनाया है। शादी के कुछ दिनों बाद लड़के-लड़की ने अपने तीनों पोते का यज्ञोपवीत संस्कार करवाने का फ़ैसला किया है। इसी उपनयन के साथ-साथ वे दोनों दशकों से करते आ रहे एकादशी व्रत का उद्यापन भी करेंगे। घर एक बार फिर मेहमानों से भरा हुआ है। उपनयन भी धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। बड़ी पोती के घर बेटी का जन्म हुआ है और परिवार ने अपनी चौथी पीढ़ी का स्वागत किया है।
एक्कीसवीं सदी अब टीनेज से बाहर आने वाला है। विश्व करोना जैसी वैश्विक महामारी से जूझ रहा है। करोना गाँव तक नहीं पहुँचा है परंतु लड़के-लड़की शहरों में रह रहे अपने परिजनों के लिए बहुत चिंतित है। देश भर में लाक्डाउन लगा हुआ है।बड़ी बहू चारों छोटे बच्चों के साथ गाँव लौट आयी है। इस महामारी में परिवार एक साथ गाँव में रह रहा है बस दोनों पोता घर से दूर है। ये वो वक़्त है जब दिल्ली वाक़ई बहुत दूर लगने लगा है। महामारी का प्रकोप दो सालों बाद धीरे-धीरे कम हुआ है। दूसरा पोता अब कोलकाता में रहने लगा है। वह अब पी॰आर॰ ओ॰ के तौर पर भारतीय रेल के लिए काम करता है। गाँव में चुनाव का माहौल है। छोटे बेटे की ग्रामीण राजनीति में दिलचस्पी भी है और क़ाबिलियत भी। इस बार के चुनाव में छोटी बहू ज़िला समिति की प्रत्याशी है। घर एकजुट होकर चुनाव की तैयारी में लगा है। चुनाव का परिणाम भले ही पक्ष में ना आया हो परंतु समाज का एक हिस्सा ने समर्थन दिखाया है।
घर अब एक और उत्सव की तैयारी कर रहा है। बड़े पोते की शादी तय हुई है। घर में एक और एंजिनीर जुड़ गया है। पूरा परिवार शादी में सम्मिलित होने के लिए बोकारो आया है। लड़का-लड़की की भी इच्छा थी कि शादी में सम्मिलित हो सके परंतु सफ़र लम्बा है अतः उम्र साथ नहीं दे सका। शादी धूम-धाम से सम्पन्न हुई। लड़के-लड़की ने शादी के बजाय बहुभोज में तमाम स्वजनों का स्वागत किया। घर के छोटे बच्चे भी अब बड़े हो रहे हैं। दूसरी पोती अब दसवीं कक्षा में है। तीसरी पोती पढ़ाई के साथ साथ खेल-कूद में भी सक्रिय है। तीसरा पोता अब दूसरे शहर के होस्टल में रहने लगा है। दूसरे पोते की शादी की बात चल रही है।
आज सात जुलाई है। लड़के लड़की की शादी को आज 58 साल हो गया है। इन 58 सालों में लड़का-लड़की का परिवार 2 से बढ़कर 25 लोगों का हो चुका है। परिवार गाँव से लेकर महानगरों तक फैला हुआ है। उम्र के साथ साथ लड़के-लड़की की एक दूसरे पर निर्भरता और बढ़ गयी है। सुनने और देखने की शक्ति पर भी उम्र का प्रभाव पड़ा है परंतु अब भी दोनों अपेक्षाकृत स्वस्थ हैं तथा सही मायने एक दूसरे के पूरक हो गये हैं। दोनों के साथ का सफ़र वाक़ई गर्वित करने वाला है। उम्र का ये वो पड़ाव है जब दोनों की इच्छा है की परिजन आसपास रहे परंतु अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए आज भी बड़े हौसले के साथ विदा करते है। वे चाहते हैं कि जो जहां भी रहे खुशहाल रहे और जो परिवार दोनों ने पिछले 6 दशकों में साथ मिलकर बनाया है उसकी समृद्धि और ख़ुशहाली को बरकरार रख सके।
![]() |
| लड़का-लड़की February 2022 |
मैं उस लड़का-लड़की का बड़ा पोता हूँ और अपनी ज़िंदगी के तीन दशकों में जितना मैंने उन दोनों को जाना है समझा है, वे दोनों वाक़ई इस दुनिया के दो सबसे खूबसूरत इंसान है।
- रीतेय
7 जुलाई 2022
#दादाजी_दादीमाँ




No comments:
Post a Comment