ये बीसवीं सदी का अंत है और शायद शुरू होने के पहले ही हम तीन भाई-बहनों के बचपन का भी। उस वक़्त क्या हुआ हम ये तो समझ रहे थे पर क्यों हुआ, कैसे हुआ और आगे क्या होगा? ये सब समझने के लिए हम शायद बहुत छोटे थे। उस दौर को याद करते हुए यही याद आता है कि पैतृक पक्ष और मातृक पक्ष की एकजुटता ने हमें बिखरने नहीं दिया। वो कहते हैं ना कि माँ-बाप भले ही एक हो पर क़िस्मत सबकी अपनी अपनी होती है। हमारी कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। हंस उस वक़्त परिवार में सबसे छोटा था, सबका दुलारा भी। शरारती था सो किताबों से ज़्यादा कुश्तियों में ख़ुद को व्यस्त रखता था। हम तीनों साथ-साथ स्कूल जाते थे। दीदी और मैं कुछ पढ़कर लौटते थे और हंस किसी को पीटकर। ऐसा नहीं था कि हंस पढ़ता-लिखता नहीं था पर अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही पढ़ता था। उस वक़्त गाँव में एक प्राइवेट स्कूल की स्थापना हुई। हंस के लिए महीने भई की फ़ीस 60 रुपए लगती थी और वो ये बात जानता था। इसलिए उसने कभी 61 रुपए की पढ़ाई नहीं की। अगर वो किसी दिन स्कूल नहीं जाता तो अपने गुल्लक में से 2 रुपए निकालकर मम्मी को ये कहते हुए लौटा देता था कि आज हम इस दो रुपए के बराबर की पढ़ाई नहीं किए इसलिए ये आप वापस रख लो।
दीदी हम तीनों में बड़ी थीं और अपेक्षाकृत समझदार भी। पढ़ने-लिखने में अव्वल थीं। हंस सबसे छोटा था, शरारती था, मारने-पीटने में अव्वल और पढ़ाई-लिखाई में औसत था। गाँव से ननिहाल तक दीदी की इज़्ज़त ज़्यादा थी सो यही वजह रही होगी की मैंने दीदी और हंस में से दीदी के जैसा होना चाहा होगा। छोटे मामा जी एक बार गाँव आये और दीदी और मुझे अपने साथ लेकर चले गये और ये पहला मौक़ा था जब हमारे रास्ते अलग हुए। दीदी और मैं क्रमशः 2003 और 2004 में नवोदय विद्यालय के लिए चयनित हो गये और हंस गाँव से ननिहाल आ गया। पढ़ने-लिखने के मामले में ननिहाल की स्थिति कहीं ज़्यादा बेहतर थी। हमारा बचपन बिलकुल अलग हो गया। मैं और दीदी एक ही कैंपस में थे सो 2008-2009 तक लगभग साथ रहे और हंस हम दोनों से अलग। हंस की दुनिया अलग थी। वह नानी गाँव में रहकर ही पढ़ने लगा। दीदी और मैं बस स्कूल की छुट्टियों में घर आते थे तो कहीं ना कहीं घरवालों का अटेंशन हंस के मुक़ाबले हमें ज़्यादा मिलता था। उस वक़्त शायद हम ये समझने के क़ाबिल नहीं थे परंतु अब सोचने पर लगता है कि ये पहला दौर रहा होगा जब हंस ने भावनाओं का अभाव महसूस किया होगा। हर वो चीज़ जो दीदी और मेरे लिए पा लेना आसान था उसके लिए हंस को ज़िद करनी पड़ती थी। उस दौर में हंस का ज़िद्दी हो जाना स्वाभाविक रहा होगा। ख़ायर, मामा जी ने जितनी मेहनत दीदी और मुझपे किया था उससे कहीं ज़्यादा मेहनत उन्होंने हंस पर किया और उसका परिणाम भी मिला। दसवीं की परीक्षा हंस ने भले ही स्टेट-बोर्ड से दिया हो परंतु वो ज़िला के अव्वल छात्रों में शामिल था। ननिहाल में रहते हुए हंस भी दीदी और मेरी तरह, मातृत्व स्नेह से वंचित रहा (पितृत्व स्नेह से तो हम बचपन में ही वंचित हो चुके थे) परंतु पढ़ाई के साथ-साथ उसने सामाजिकता सीखी, कुछ अच्छी-कुछ बुरी। मामा जी के साथ-साथ गाँव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का हिस्सा बना।
दसवीं के बाद मैं राँची चला गया अगले साल दीदी और हंस पटना चले गये। हम सब इंजीनियरिंग कॉलेज के एंट्रेंस की तैयारी में लगे हुए थे। दीदी 2011 में WB JEE के माध्यम से हेरिटेज, कोलकाता चलीं गयीं। मैं अपनी असफलताओं की गठरी बंधे पटना चला गया। अब मैं और हंस दोनों साथ में IIT JEE की तैयारी कर रहे रहे। दीदी का एडमिशन प्राइवेट कॉलेज में होने से घर की आर्थिक स्थिति पर असर आया। उस वक़्त अकेले दादाजी अपने पेंशन के बूते 12 लोगों के परिवार की ज़िम्मेदारी उठाये ज़िंदगी के समंदर में अपना जहाज़ खींच रहे थे।हंस में अब भी उतना ही बचपना और ज़िद मौजूद था जितना कि उसमें चार-पाँच साल पहले रहा हो। गाँव से शहर का ट्रांजिशन बहुत मुश्किल होता है। मैं ये ट्रांजीशन बचपन में झेल चुका था और छोटे शहर से बड़े शहर का ट्रांजीशन लगभग साल भर पहले। परंतु हंस के लिए ये गाँव से शहर का ट्रांजीशन बहुत मुश्किल रहा। साल भर तो उसे ये समझने में लग गया कि वो पटना आया क्यों था। पटना में बाज़ार समिति वो इलाक़ा था जहाँ उस वक़्त फ्री में कुछ और मिले ना मिले लेकिन महीने भर की टॉक-टाइम और इंटरनेट डेटा वैलिडिटी के साथ मोबाइल का सिम हर दूसरे दुकान में मुफ़्त मिलता था।एंड्राइड स्मार्टफ़ोन ने सालों से चलती आ रही नोकिया सिंबियन 60 को सस्ते क़ीमत पर महँगा टक्कर दिया था।अब अमिताभ बच्चन से लेकर रणबीर कपूर तक सिर्फ़ 10-15 रुपए में आपकी फ़ोन स्क्रीन तक लाए जा सकते थे। स्टेशनरी की दुकान में कलम-किताब से कहीं तेज़ी से फ़ोन में फ़िल्म डाउनलोड की बिक्री बढ़ रही थी। हंस इन सब के बीच कहीं खो गया। पटना प्रवास के दो सालों में उसने उतनी ही पढ़ाई की की इंटरमीडिएट में फर्स्ट डिवीज़न से पास हो सके। इंजीनियरिंग के एंट्रेंस एग्जाम में मोबाइल नंबर के जैसा रैंक था उसका। अब तक की ज़िंदगी में हंस की दृष्टि से हंस के लिए ये दो साल सबसे आसान और खुशहाल रहा था। अगले साल मैं कॉलेज चला गया और उस वक़्त हंस को शायद यही लगा होगा कि इंजीनियरिंग कॉलेज जाना ही परिवार में इज़्ज़त पाने का एकमात्र तरीक़ा है। उसने पूरी कोशिश की कि घरवाले उसे किसी भी प्राइवेट कॉलेज में एडमिशन दिलवा दे। मैं पिछले आठ-नौ महीनों में हंस के साथ रहते हुए हंस को इतना समझ चुका था की ये कुछ और भले ही कर ले पर फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में बेसिकली लॉजिकल चीज़ों में दिमाग़ खपाना उसके वश की बात नहीं थी। मैंने उसके प्राइवेट कॉलेज में एडमिशन लेकर B. Tech, BBA, BCA करने के ख़याली पुलाव के आँच को धीमा क्या लगभग बंद ही कर दिया था। मैंने यही सुझाव दिया कि अगर इंजीनियरिंग ही करनी है तो दोबारा JEE की तैयारी कर लो। उसने तैयारी शुरू की और अगले चार-पाँच महीनों में ट्यूशन सेंटर्स को पूरी फ़ीस देने के बाद उसे ये एहसास हो गया की इंजीनियरिंग एंट्रेंस उसकी दुनिया की चीज़ नहीं है।
इसके बाद शुरू हुआ वो दौर जिसने हंस को वो बनाया जो वो आज है।परंतु ये सफ़र हंस के लिए इतना आसान नहीं था। वो दिल्ली आ गया और डिस्टेंस लर्निंग के माध्यम से जर्नलिज़्म की पढ़ाई की तथा साथ साथ DU से ग्रेजुएशन भी। इस वक़्त दीदी और मैं अपने-अपने कॉलेज में थे। हमारे पास एक प्री-डिफाइंड रास्ता था, हर महीने की पॉकेट मनी थी, और ये दोनों चीज़ें हंस के पास नहीं थी। ये वक़्त निजी तौर पर हंस के किए अभावों का दौर था। अनिश्चितताएँ थी। और ये अभावों तथा अनिश्चितताओं का दौर अगले दो तीन सालों तक रहा। कम से कम तब तक जब तक मेरी नौकरी नहीं लगी और हंस ने JIMMC में दाख़िला नहीं लिया। उसने कविताओं और ग़ज़लों में दिलचस्पी ली। कॉलेज में दाख़िला लेने के बाद भाषा और साहित्य में अपनी समझ के बदौलत अपनी पहचान बनायी। उसने कुछ ख़ूबसूरत दोस्त बनाए। अपना रास्ता उसने ख़ुद चुना। डिग्री पूरी होने के बाद उसने दैनिक जागरण के लिए पहले गुड़गाँव फिर दिल्ली में रहकर काम भी किया और वहाँ बहुत कुछ सीखा भी। नये-नये लोगों से मिला, पत्रकारिता में अपनी क़ाबिलियत के बूते आगे बढ़ा। दिल्ली हो या गुड़गाँव उसे लोग उसकी काम के वजह से जानने लगे थे। और ये तमाम चीज़ें किसी कॉलेज की डिग्री में नहीं सिखाया गया था, ये उसकी अपनी समझ थी। कहते हैं ना कि रौशनी तेज़ हो तो आँखों को चुभने लगती है। ये भी किसी आँखों को चुभा होगा सो कुछ दिनों बाद हंस ने भी पत्रकारिता को छोड़ पब्लिक रिलेशंस और मीडिया मैनेजमेंट के तरफ़ रुख़ किया। गुड़गाँव में रहकर लगभग दो साल एक PR फर्म के लिए काम किया। वहाँ भी अपनी एक अलग पहचान बनायी, अच्छे लोगों से जुड़ा, अच्छे दोस्त बनाए और फिर बेहतर भविष्य की उम्मीद लिए दिल्ली छोड़ गया। उसका दिल्ली छोड़ना निजी तौर पर मेरे लिए बहुत बड़ा नुक़सान था। हम दोनों बचपन से कभी साथ नहीं रह पाये पर 2016 से अगले पाँच सालों तक उसकी नौकरी के हिसाब से एनसीआर में कभी एक साथ तो कभी अलग-अलग रहते हुए हमारा रिश्ता दो बड़े-छोटे भाई से बढ़कर दोस्ती का हो गया जहाँ हम एक दूसरे की ज़िंदगी के बारे में निःसंकोच बातें कर सकते थे। एक दूसरे की सुझाव को सुनने और समझने लगे थे। 5 सालों में हम दोनों ज़िंदगी के कई उतार चढ़ाव से गुजरे पर हम साथ थे। ये हम दोनों के साथ का सबसे बेहतर दौर था। हम दुनिया में भले ही दशकों पहले आये हों पर हम दोनों एक-दूसरे के लिए कितने आवश्यक हैं ये हम इन्ही पाँच सालों में समझ पाये थे। सही मायने में हंस मेरे लिए मेरी निश्चिंतता है।
दो साल पहले हंस इंडियन रेलवे की सब्सिड्री ब्रैथवेट के लिए काम करने कोलकाता चला गया और अगले दो सालों में उसने अपना नया पता कोलकाता को उतना ही अपना बना लिया जितना की उसने दिल्ली और गुड़गाँव को बना लिया था। उसके चारों ओर एक बार फिर से ख़ूबसूरत लोगों की एक दुनिया ख़ूबसूरत दुनिया है जिसमें उसके लिए उसके हिसाब का काम भी है, उसके सुकून के लिए कला भी है और साहित्य भी है। अब उसकी ख़ुद की एक अभाव-रहित ज़िंदगी है और अपने साथ-साथ आसपास की ज़िन्दगियों पर उसका अपना एक प्रभाव भी है।
और हाँ, दिल्ली के बाद कोलकाता का सफ़र भले ही कुछ समय तक उसके निजी ज़िंदगी के लिये अकेलापन का दौर रहा हो परंतु लगभग पिछले आठ-नौ महीनों से आकांक्षा की मौज़ूदगी ने उस अकेलापन को लगभग ख़त्म कर दिया है और आगामी 27 फ़रवरी के बाद दोनों की ज़िंदगी के रास्ते एक हो जाएँगे। दोनों अपने-अपने हिस्से का रंग लेकर एक दूसरे की ज़िंदगी में और बेहतर रंग भरेंगे।
निजी तौर पर हंस की शादी मम्मी-पिताजी के लिए आख़िरी निजी उत्सव है और इस दशक में परिवार का भी आख़िरी उत्सव, तो इस उत्सव पर खूबसूरत जोड़े के आगामी भविष्य के लिए आपकी बधाई पहुँचे।
— रीतेय
#akankshans #Feb27



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