Tuesday, 4 November 2025

पितामह का जन्मदिन 🎂

तुम इस दुनिया की उलझन में न उलझो,

तुम्हारे बाद भी दुनिया रहेगी।


यह पंक्ति मैंने भले ही कभी अपने आपको संभालने के लिए लिखी हो, परंतु मैंने अपने पितामह को ऐसी ही सुलझी हुई ज़िंदगी जीते हुए देखा है। दादाजी मुझे तब से याद हैं जब उनके ज़्यादातर बाल काले हुआ करते थे। मैंने उन्हें साइकिल चलाकर स्कूल जाते हुए भी देखा है, गर्मी की छुट्टियों में खेत-खलिहान जाते हुए भी, और घर पर रहने पर मुहल्‍ले के पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को समय निकालकर पढ़ाते-लिखाते हुए भी।




मैंने उनकी खुशी देखी है, उनका दुःख भी देखा है, पर उनके जैसा हँसी और उदासी के बीच का संतुलन और सामंजस्य बनाते किसी और को नहीं देखा। वो चिंतित हुए भी तो उनकी चिंता बच्चों तक नहीं आई। वो अपने गाँव-मुहल्ले में सरकारी नौकरी करने वाले शायद पहले जनरेशन थे। उनका बचपन और जवानी बहुत अभावग्रस्त रहा, परंतु नौकरी के बाद की उसी आफ़ियत ने उनके अंदर के इंसान को नहीं बदला। हम सबने भले ही कोविड के बाद “बेयर-मिनिमम” वाली ज़िंदगी के तौर-तरीके को समझा हो, परंतु पितामह की पूरी ज़िंदगी ही बेयर-मिनिमम वाली रही है।


जितना मैं जानता हूँ, ताउम्र उनकी कुल मिलाकर दो लोगों से दोस्ती रही , एक वो जिनके साथ दादाजी बचपन में गाय-भैंस चराते थे, और दूसरे मेरे नानाजी, जिनके साथ उन्होंने पढ़ाई-लिखाई और नौकरी की। इन दोनों के अलावा भी शायद एक-आध लोग और रहे होंगे। उन्होंने रिश्ते भले ही बहुत कम बनाए हों, परंतु जितने भी बनाए — सब के सब ताउम्र वाले रिश्ते बने।


ज़रूरतों के नाम पर उनकी लिस्ट उँगलियों पर गिनी जाने वाली है — घड़ी, रेडियो, टॉर्च, कलम और पान। दादाजी ने न कभी इससे ज़्यादा की इच्छा रखी, न ही उन्हें इससे ज़्यादा किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ी। दादाजी मैथिली, हिंदी, संस्कृत के अलावा अंग्रेज़ी, बंगला और उड़िया की भी समझ रखते हैं, और जगह, समय तथा रेडियो फ्रीक्वेंसी के अनुकूल इनमें से किसी भी भाषा में समाचार और क्रिकेट की कॉमेंट्री सुनते रहे हैं। उम्र के साथ उनकी सुनने की क्षमता में, और फिलिप्स तथा पैनासोनिक जैसी कंपनियों के रेडियो बनाने की क्वालिटी में भले ही गिरावट आई हो, परंतु उनका लगाव यथावत है। रेडियो के साथ तो लगाव ऐसा है कि दो दिन बिना दादी माँ के भले ही रह लें, पर बिना रेडियो के रहना उनके लिये बहुत मुश्किल होता है।


लगभग दस दशकों की ज़िंदगी में उन्होंने यकीनन बहुत कुछ खोया और पाया है, परंतु ज़िंदगी के तमाम खोया–पाया और उलझनों के बीच उन्होंने हमेशा अपने-आप को सुलझाए रखा। बचपन में जब मेरे साथी मुझसे पूछते थे “तुम्हारे आदर्श कौन हैं?” मैं दादाजी का नाम लेता था। और मुझे यकीन है कि अगर यही सवाल मेरे सामने मेरे “चौथेपन” में भी दोहराया गया तो उत्तर अपरिवर्तित रहेगा।


मेरे दादा का बचपन मेरे जैसा तो नहीं था,

मैं चाहूँगा मगर अपना बुढ़ापा उनके जैसा।


आज ५ नवंबर को पितामह का जन्मदिन है और मैं ईश्वर से कामना करता हूँ कि दादाजी को स्वस्थ, समर्थ और दीर्घायु रखे।

पितामह को जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! 🎂🎉


- रीतेय #reetey #grandpa #birthday

Saturday, 19 July 2025

चोरों की बात

हालिया कोल्डप्ले कॉन्सर्ट समेत अन्य घटनाओं के मद्दे-नज़र

चोरों के हक़ में कही गई यह बात कि चोर को सिर्फ़ चोरी करते वक्त ही पकड़ा जा सकता है, चोरों को एक हद तक छूट ज़रूर देती है कि वे छिप-छिपाकर चोरी करते रहें। एक और बात जो चोरों के हक़ में है, वह यह कि चोर वही कहलाए जो पकड़े जाएँ। जो नहीं पकड़े गए, उन्हें कम से कम दुनिया ने तो चोर नहीं कहा। वे सिर्फ़ और सिर्फ़ आईने के सामने चोर रहे।


अपने हक़ में कही गई इन्हीं बातों को मद्दे-नज़र रखते हुए, अलग-अलग तरह के चोर, अलग-अलग चीज़ों की चोरी लगातार करते रहते हैं। कोई पैसों की चोरी करता है, कोई भावनाओं की, तो कोई भरोसे की। पहले किस्म के चोरों के लिए क़ानून है, इसलिए क़ानून अपने लंबे हाथों से चोर को एक न एक दिन पकड़ ही लेता है। दूसरे और ख़ासकर तीसरे किस्म के चोरों के लिए कोई ख़ास क़ानून नहीं है, इसलिए उनके पकड़े जाने की संभावना भी कम होती है। चूँकि इनके पकड़े जाने की संभावना कम होती है, अतः इस किस्म के चोर ज़्यादा होते हैं। और चूँकि इस किस्म के चोर ज़्यादा हैं, तो आगे बात भी उन्हीं की होगी।


एक तीसरी बात भी है, जो ख़ासकर बहुसंख्यक चोरों के हक़ में है भी और नहीं भी। वह यह कि चोरी जितनी देरी से पकड़ में आती है, नतीजा उतना ही गंभीर होता है। शुरुआती दौर में पकड़े गए चोर, अपने हिस्से की थोड़ी-बहुत सज़ा काटकर एक नई ज़िंदगी शुरू कर लेते हैं, लेकिन वे जिन्हें पकड़े जाने में वक्त लगता है, उन्हें चोरी की आदत लग चुकी होती है। उनके लिए यह सब न्यू-नॉर्मल हो चुका होता है। चोरी करते-करते वे उस हद तक पहुँच जाते हैं जहाँ उन्हें छिप-छिपाकर चोरी करना ठीक नहीं लगता। वे अब दिखा-दिखाकर चोरी करने लगते हैं। वे अब भी अपनी चोरी छुपा रहे होते हैं, पर सिर्फ़ उनसे, जिनके भरोसे की चोरी की जा रही होती है। और एक दिन अगर अनायास वे पकड़े जाते हैं, तो पकड़े जाने पर अपनी चोरी के लिए दुनिया भर की तमाम चीज़ों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं — चाहे निजता का हवाला ही क्यों न देना पड़े। उनके हिसाब से भरोसे और विश्वास की चोरी करना गुनाह नहीं होता, बल्कि गुनाह ये होता है कि बिना उनकी इजाज़त के उन्हें चोरी करते हुए पकड़ा क्यों गया?


ख़ैर, पकड़े जाने के बाद उनके पास क़तरा-क़तरा करके उतना ही समय बचता है कि वे बस दूसरों और खुद के साथ की गई इस चोरी की सज़ा काट सकें। सज़ा खत्म होने के बाद, ऐसे चोरों में अगर रत्ती भर भी इंसानियत बची हो, तो सिर्फ़ आत्मग्लानि बचती है, ज़िंदगी नहीं बचती।


-रीतेय

Saturday, 8 March 2025

Why Cricket? My Cricket!

 मुझे क्रिकेट बहुत पसंद है। शायद इसलिए भी कि क्रिकेट मेरे बचपन की साधारण सी ज़िंदगी की पहली असाधारण चीज़ थी। मेरा अंतेवासी होने का सफ़र 2002 की आख़िरी तिमाही में शुरू हुआ, जब मेरे छोटे मामा मुझे अपने साथ सहरसा ले आये। जब 2003 का वर्ल्ड कप स्टार्ट हुआ तो हर तरफ़ एक अलग ही जुनून था। मामा जी अपने स्कूल और कोचिंग सेंटर के कामों में भले ही व्यस्त रहते हों पर क्रिकेट मैच देखने का मौक़ा नहीं छोड़ते थे।

 मेरे लिये उस वक़्त क्रिकेट बिलकुल नयी चीज़ थी। उस वक़्त भी कुछ प्रैक्टिस मैचेज हुए होंगे पर वो मुझे याद नहीं है लेकिन लीग स्टेज में भारत का पहला मैच शायद हालैंड से था और उस मैच में भारत की टीम पहले बल्लेबाज़ी करते हुए अपने पूरे पचास ओवर भी नहीं खेल पायी थी। भारत अंततः वो मैच जीत गया पर अगले दिन के अख़बार का हैडलाइन था भारत का 50 ओवर नहीं खेल पाना और सचिन का अर्धशतक जो शायद भारत की ओर से एक खिलाड़ी का सर्वाधिक योगदान था। इस मैच के बाद से लेकर अगले मैच तक भारतीय टीम के परफॉरमेंस पर खूब चर्चे होते रहे और मेरे अंदर का जिज्ञासु बच्चा शायद उस चर्चा की ओर धीरे-धीरे खिंचता चला गया। मैं बाक़ी लोगों के साथ नियमित रूप से मैचे देखने लगा। उन दिनों मेरे बहुत से बेतुके सवाल भी होते थे, जैसे खेल में स्ट्राइकर और नॉन-स्ट्राइकर एंड को जोड़कर विकेट तो 6 ही हैं तो पहले मैच में भारत के 10 विकेट कैसे गिरे? आख़िरी खिलाड़ी बिना आउट हुए ही वापस क्यों आ गया? ऐसे बहुत से सवाल थे और मेरे इन बेतुके सवालों के तर्क संगत उत्तर ने शायद मेरे लिए क्रिकेट को रुचिकर बना दिया। लीग स्टेज में भारत ऑस्ट्रेलिया से हार गई परंतु ग्रुप के बाक़ी टीमों के सामने विजेता बनकर उभरी। एक मैच में युवराज ने शतक बनाकर शायद बांग्लादेश को आउटस्कोर किया था। एक मैच में आशीष नेहरा ने सामने वाले टीम के ५-६ बल्लेबाजों को पवेलियन का रास्ता दिखाया था। लीग स्टेज ख़त्म होते होते मैं क्रिकेट के  लगभग सभी सामान्य नियमों से अवगत हो गया था और जो थोड़ी बहुत कमी थी उसे किताबों के सहारे समझ लिया। सुपर-सिक्स, क्वार्टर-फाइनल और सेमी-फाइनल आते-आते भारत के साथ-साथ विपक्षी टीमों के खिलाड़ियों को नाम और चेहरों से पहचानने लगा था। साथ ही साथ क्रिकेट की वजह से रोज़-रोज़ अख़बार पढ़ने की आदत भी लग गई थी। 

भारतीय टीम फाइनल में पहुँच गई और सामने ऑस्ट्रेलिया की टीम थी। फाइनल देखने के लिए मुख्य हॉल में टीवी लगाया गया और मैंने वो मैच ज़हीर ख़ान के पहले ओवर से भारतीय टीम की आख़िरी विकेट तक देखा। भारत की हार से बहुत आहत हुआ। पोंटिंग के वन-हैंडेड सिक्सेस ने स्मृति-पटल पर ऐसे निशान बनाये जो आज तक सलामत हैं। एक उम्र तक बैट में स्प्रिंग वाली बात सच लगती रही। भारत का फाइनल में  हार जाना किसी फुल-ऑन एंटरटेनिंग मूवी के सैड-एंडिंग हो जाने जैसा था। वर्ल्ड कप के अगले दिन उस वक़्त के हिंदुस्तान अख़बार का हैडलाइन था “आह! एक सुंदर सपना टूट गया”। अख़बार क्रिकेट और क्रिकेट्रर्स के खबरों से भरा पड़ा था। एक तरफ़ विश्व-कप के साथ दुनिया भर की ख़ुशियाँ लिए दुर्जेय ऑस्ट्रेलिया की टीम और दूसरे कोने में मैन ऑफ़ टूर्नामेंट की ट्रॉफी के साथ सचिन तेंदुलकर। उस दिन के अख़बार की वो तस्वीर मैंने सहेज कर रख ली था जो शायद आज भी मेरी किसी पुरानी किताब में चिपकी हुई होगी।



जैसे अक्सर किसी अच्छी कहानी या  सिनेमा के ख़त्म होने के बाद हम उस कहानी या फिर सिनेमा में आगे क्या हुआ, को सोचने लगते हैं, ठीक उसी तरह मैं विश्व-कप के बाद  भारतीय क्रिकेट टीम और भारतीय क्रिकेटर्स के आगामी मैचेज के बारे में सोचने लगा। डिश का कनेक्शन सिर्फ़ वर्ल्ड-कप के लिए ही था तो उसके बाद का सारा क्रिकेट-कनेक्शन अख़बारों के माध्यम से ही जीवित रहा। 


अगले कुछ सालों तक मेरी सारी किताबों और नोट-बुक्स पर सिर्फ़ क्रिकेटर्स की तस्वीर ही लगती रही। 2005 में हॉस्टल चले जाने के बाद क्रिकेट से कनेक्शन थोड़ा सीमित हो गया। स्कूल में क्रिकेट खेलने की कोशिश भी की पर मेरी क़ाबिलियत क्रिकेट खेलने से ज़्यादा देखने-समझने की थी सो यदा-कदा क्रिकेट खेला और बाक़ी समय में जब भी क्लास के साथी क्रिकेट खेलते तो मैं या तो अम्पायरिंग करता या फिर कमेंटरी या फिर स्कोरिंग।


 2007 के वन डे वर्ल्डकप में न तो टीम कुछ अच्छा कर पायी और न ही स्कूल में रहते हुए हम देख पाए। 2007 के उत्तरार्ध में ऐकडेमिक बिल्डिंग में एक टेलीविज़न लगाया गया जिसका रिमोट कंट्रोल सीनियर्स के पास ही रहता था परंतु जब टी ट्वेंटी वर्ल्डकप शुरू हुआ तो क्रिकेट ने हमेशा की तरह आपसी मतभेद को कम कर दिया। अपितु,  उन दिनों हमारे स्कूल में अर्ध-वार्षिक परीक्षा का माहौल था पर हमने भारत के सारे मैचेस देखे। पाकिस्तान के साथ हुए पहले मैच ने बॉल-आउट को खेल में लाया और वो सचमुच एक अलग रोमांच था। धोनी इस वर्ल्ड-कप के काफ़ी पहले ही अपनी धुआँ-धार पारियों के वजह से चर्चा में थे और लंबे बलों वाला इस ‘लायन-हार्ट-लैड’ के पोस्टर से हॉस्टल की दीवारें भरी जा चुकी थी। उस वर्ल्ड कप में हम भले न्यूज़ीलैंड से हार गये हों लेकिन हमने ऑस्ट्रेलिया, साउथ-अफ़्रीका और इंग्लैंड को शिकस्त देते हुए एक बार फिर से पाकिस्तान को धूल चटाने में सफल हुए। पहले मैच का बॉल-आउट, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के ख़िलाफ़ युवराज की अविश्वसनीय पारी, स्टुअर्ट ब्रॉड के ख़िलाफ़ सिक्स-सिक्सेस, फाइनल  की पहली इनिंग में गौतम गंभीर की वो पारी, अंत के ओवरों में रोहित शर्मा का फाइनल टच और दूसरी इनिंग में जोगिंदर शर्मा की उस अविस्मरणीय गेंद पर मिसबाह का वो अप्रत्याशित शॉट और अंततः श्रीसंथ के हथों वो एक आसान सा कैच! 2007 में भारतीय क्रिकेट का ये शायद सबसे बड़ा हाईलाइट था। 



2008 से लेकर 2010 तक का क्रिकेट मुझे ज़्यादा याद नहीं है एक्सेप्ट फॉर दादा का रिटायरमेंट, सचिन के सारे इनिंग्स और ख़ासकर ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ वन मैन आर्मी वाला 175 और अगले साल साउथ-अफ़्रीका के ख़िलाफ़ फर्स्ट-मैन-ऑन-द-प्लेनेट वाला अनबीटन 200*। 



बीच-बीच में आईपीएल के कुछ फ़ाइनल्स भी हुए जो मैंने अपने दोस्तों के घर रुक कर देखा। क्रिकेट मुझे तब भी उतना ही पसंद था जितना की आज पर उन दिनों मैं क्रिकेट से कहीं ज़्यादा किताबों और उलझा हुआ था। 2011 में जब वन-डे विश्व कप  शुरू हुआ तो मैं राँची छोड़कर पटना आ चुका था और अपनी पिछली असफलताओं के बाद करो या मरो की स्थिति में वन-फाइनल-पुश की तैयारी में तन-मन से लगा हुआ था। वर्ल्ड-कप 2011 का मैंने शायद फाइनल देखा था वो भी सहवाग के आउट होने के बाद का और उसके पहले के एक-आध मैच उतना ही देख पाया जितना किसी साइकिल की दुकान पर पंचर बनवाते हुए तो किसी कॉपी-किताब की दुकान पर कॉपी-कलम ख़रीदते हुए देखा जा सकता था। लेकिन उन दिनों ये तमन्ना थी कि काश सुकून से ये मैचेस देख पाता! भारत विश्वकप जीत गया और एक हद तक मैं अपनी जंग भी। 



2012 में कॉलेज चला गया और वहाँ कुछ ऐसे दोस्त मिले जिनसे उम्र-भर क्रिकेट की बातें की जा सकती है। ज़िंदगी आगे बढ़ती गयी और मेरी और क्रिकेट की कहानी भी। जब अपना स्मार्ट फ़ोन और लिमिटलेस इंटरनेट कनेक्शन मिला तो यूट्यूब पर अपने पसंदीदा आइकन्स के वीडियोज खोज-खोज कर देखा। जब अपने घर के लिए सामान ख़रीद रहा था तो इस बात का ख़ास ध्यान रखा गया कि टीवी इतनी बड़ी ली जाए और साउंड सिस्टम इतना अच्छा हो कि क्रिकेट देखते हुए स्टेडियम वाली फील आ सके। 


2023 के विश्व-कप के दौरान पाँच नवंबर को कोलकाता जा कर भारत और दक्षिण-अफ़्रीका का मैच देखने का मौक़ा मिला। ये मेरे लिए इन-स्टेडियम मैच देखने का पहला अवसर था। कोलकाता के ईडन गार्डेन में रोहित की धुंआधार पारी, कोहली का उननचासवाँ शतक और जड्डू के फाइव-विकेट-हॉल के साथ भारत की जीत का जश्न मनाने का मौक़ा मिला। दिल्ली से कोलकाता का ये ट्रिप इसलिए भी ख़ास था क्योंकि इस इंस्टेंट ट्रिप की प्लानिंग से एक्सक्यूशन तक मेरे अंदर का ‘क्रिकेट फैन’ सेंटर स्टेज पर था। 



बाक़ी के मैचेस घर पर ही देखा और न्यू-ज़ीलैंड को शिकस्त देने के बाद हम फिर एक बार क्रिकेट विश्व-कप का फाइनल खेलने वाले थे। यद्यपि 2023 के विश्व-कप में, 2011 के बाद भारत के लिए एक बार फिर से घर में फाइनल जीतने का बेहतर मौका था और हमारी टीम वाकई टूर्नामेंट की सबसे अच्छी टीम थी पर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के होने से यादों में न चाहते हुए भी 2003 नॉक-नॉक करता हुआ आ जा रहा था । वो कहते हैं न कि दूध का जला छांछ भी फूँक-फूँक कर पीता है तो ठीक मेरी हालत भी वैसी ही थी और मेरी ये कविता मेरे अन्तर्मन में चल रहे उसी उहापोह का एक उदाहरण भी है।


“मैं प्रसंशक खेल का और खेल का यह धर्म है,

जय-पराजय से परे प्रतिभागियों का कर्म है।


दो दशक से देखता मैं आ रहा इस खेल को,

शौर्य-शोहरत, ओज-ऊर्जा के अनोखे मेल को।


चाहेगा अभी कौन बोलो जीत से कुछ कम मिले?

हो विजयी हम और पूरे मुल्क का मौसम खिले।


हम यहाँ तक आये हैं तो विजय के हक़दार हैं,

श्रेष्ठतम संघर्ष होगा और हम तैयार हैं।


किंतु दोनों प्रबल,  दोनों सबल जब टकरायेंगे,

अंततः कोई एक इनमें से जयी कहलायेंगे।


ग्यारह के ग्यारह अगर उत्कृष्टता से खेल लें,

जय-पराजय जो भी हो हम हँसते-हँसते झेल लें।


मैं प्रशंसक खेल का हूँ और मेरा यह फैसला,

जीत में बनूँ जश्न, हो गर हार तो बनूँ हौसला।”


ये कविता फाइनल के पहले लिखी थी और हुआ वही जो नहीं होना चाहिए था। हम एक बार फिर ऑस्ट्रेलिया के सामने टिक नहीं पाए! अच्छी शुरुआत के बावज़ूद हम आशानुरूप रन नहीं बना सके और अंततः पैट कमिंस की ऑस्ट्रेलियाई टीम के हाथों अहमदाबाद में मिली हार ने मुझे वर्चुअली वापस 2003 में पहुँचा दिया। वहाँ दादा - यहाँ रोहित, वहाँ सचिन - यहाँ विराट, वहाँ पोंटिंग - यहाँ हेड और इस सबको टीवी स्क्रीन के सामने हक्का-बक्का देखता हुआ वहाँ दस साल का बच्चा और यहाँ इंडियन क्रिकेट का फैन जर्सी पहने, अपने घर में सोफा से उतर कर फर्श मायूस और हताश बैठा एक तीस साल का आदमी। दुःख हुआ, बहुत दुःख हुआ और महीनों तक पूरे देश के साथ ‘खड़ा हूँ आज भी वहीं’ पर वाइब करता रहा। घर, ऑफिस, गली-मुहल्ले जहाँ भी मौक़ा मिला इस दुःख को कम करने की उम्मीद लिए इस पर बातें करता रहा। 



साल बदला और फिर 2024 में क्रिकेट ने हम जैसों को एंटरटेन होने का एक और मौक़ा दिया। टी-20 विश्व कप! कैरेबियन द्वीपसमूह और अमेरिका में खेले गये इस विश्व-कप में भारत ने फाइनल सहित कुल 9 मैचेस खेले और हम अजेय रहे । साउथ अफ्रीका के साथ हुआ फाइनल मुक़ाबला आख़िरी गेंद तक रोमांचपूर्ण रहा। इस विश्व कप में भारत की ओर से रोहित ने सर्वाधिक रन बनाया, अर्शदीप ने सर्वाधिक विकेट लिए, जसप्रीत बुमराह के ऑल राउंड और इंपैक्टफ़ुल प्रदर्शन ने उसे प्लेयर ऑफ़ द टूर्नामेंट और हमें विश्व विजेता बनाया । भारत का तिरंगा बारबाडोस से लेकर वानखेड़े स्टेडियम तक लगातार लहराता रहा और हम खुश होते रहे। इस विश्व-कप की कुछ तस्वीरें क्रिकेट की कालजयी तस्वीरें में शामिल की जाएगी । भारतीय टीम के इस अतुल्य कारनामे के साथ साथ ये विश्व कप रोहित, विराट और जडेजा के आख़िरी अंतर्राष्ट्रीय टी 20 अपीयरेंस के लिए भी याद किया जाएगा। और हाँ, विश्व कप 2023 में मिले घाव के लिए मरहम के तरह भी! अजेय भारत के फाइनल विजय के बाद की एक कविता-


“ये है रोहित-विराट की जीत, 

जीत का जेता है जसप्रीत।


लिखा हार्दिक ने विजयक्षर,

संग कुलदीप, अर्श, अक्षर।


देश में उत्सव का आगार,

सूर्य है चमका आख़िरकार।


ऋषभ के दस्ताने का तेज़,

करे प्रतिद्वंदी को निस्तेज।


शिवम की ताकतवर हर वार,

रवींद्र तो है नंगी तलवार।


यशस्वी, चहल, संजू, सिराज,

हैं आनेवाले कल के ताज।


ये सब हैं राहुल के गौरव,

विजेता हैं ये सब के सब।”



2024 के पहले हाफ में क्रिकेट ने हमें जितनी ख़ुशी दी, दूसरे हाफ में उसी हिसाब से निराशा भी! हम 12 साल बाद होम ग्राउंड पर टेस्ट सीरीज हारे और शायद 24 साल बाद टेस्ट में क्लीन स्वीप हुए। अपने घर में मिली हार के बाद हम ऑस्ट्रेलिया गए और वहाँ भी ये सिलसिला जारी रहा। टेस्ट प्रारूप में बैक टू बैक मिले सेटबैक्स ने हमारे हाथ से, लगातार दो बार से मिल रहे, वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप फाइनल का टिकट छीन लिया। टीम की भुला देने वाली प्रदर्शन के बावजूद ये बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफ़ी, बुमराह के शानदार गेंदबाज़ी और प्लेयर ऑफ़ द सीरीज प्रदर्शन के लिए याद रखा जाएगा । 


मेरे लिए क्रिकेट और क्रिकेट से जुड़ी कहानी, अनुभव की एक अनवरत यात्रा के समान है। इस खेल में होने वाले हर एक्शन जैसे बल्लेबाज़ों के मनोभाव को समझते या समझने की कोशिश करते हुए सटीक गेंदबाज़ी उसी तरह गेंदबाजों की मनः स्थिति को समझते हुए या फिर कई बार उसे छिन्न भिन्न करने की सोच रखकर आक्रामक बल्लेबाज़ी, टीम और खेल की ज़रूरत के अनुसार अटैक और डिफेंस, चुस्त-दुरुस्त और तेज-तर्रार क्षेत्ररक्षण, कभी जीत तो कभी हार पर हमेशा फिर से खेलने को तैयार, ऐसी हज़ारों चीज़ें हैं जो मुझे आम ज़िंदगी से जुड़ी लगती है । 


हम कल भी एक फाइनल खेलने वाले हैं, जिसके लिए रोहित की इस भारतीय टीम को शुभकामनाएँ। बाक़ी यहाँ से आगे की कहानी फिर कभी..!


-रीतेय