तुम इस दुनिया की उलझन में न उलझो,
तुम्हारे बाद भी दुनिया रहेगी।
यह पंक्ति मैंने भले ही कभी अपने आपको संभालने के लिए लिखी हो, परंतु मैंने अपने पितामह को ऐसी ही सुलझी हुई ज़िंदगी जीते हुए देखा है। दादाजी मुझे तब से याद हैं जब उनके ज़्यादातर बाल काले हुआ करते थे। मैंने उन्हें साइकिल चलाकर स्कूल जाते हुए भी देखा है, गर्मी की छुट्टियों में खेत-खलिहान जाते हुए भी, और घर पर रहने पर मुहल्ले के पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को समय निकालकर पढ़ाते-लिखाते हुए भी।
मैंने उनकी खुशी देखी है, उनका दुःख भी देखा है, पर उनके जैसा हँसी और उदासी के बीच का संतुलन और सामंजस्य बनाते किसी और को नहीं देखा। वो चिंतित हुए भी तो उनकी चिंता बच्चों तक नहीं आई। वो अपने गाँव-मुहल्ले में सरकारी नौकरी करने वाले शायद पहले जनरेशन थे। उनका बचपन और जवानी बहुत अभावग्रस्त रहा, परंतु नौकरी के बाद की उसी आफ़ियत ने उनके अंदर के इंसान को नहीं बदला। हम सबने भले ही कोविड के बाद “बेयर-मिनिमम” वाली ज़िंदगी के तौर-तरीके को समझा हो, परंतु पितामह की पूरी ज़िंदगी ही बेयर-मिनिमम वाली रही है।
जितना मैं जानता हूँ, ताउम्र उनकी कुल मिलाकर दो लोगों से दोस्ती रही , एक वो जिनके साथ दादाजी बचपन में गाय-भैंस चराते थे, और दूसरे मेरे नानाजी, जिनके साथ उन्होंने पढ़ाई-लिखाई और नौकरी की। इन दोनों के अलावा भी शायद एक-आध लोग और रहे होंगे। उन्होंने रिश्ते भले ही बहुत कम बनाए हों, परंतु जितने भी बनाए — सब के सब ताउम्र वाले रिश्ते बने।
ज़रूरतों के नाम पर उनकी लिस्ट उँगलियों पर गिनी जाने वाली है — घड़ी, रेडियो, टॉर्च, कलम और पान। दादाजी ने न कभी इससे ज़्यादा की इच्छा रखी, न ही उन्हें इससे ज़्यादा किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ी। दादाजी मैथिली, हिंदी, संस्कृत के अलावा अंग्रेज़ी, बंगला और उड़िया की भी समझ रखते हैं, और जगह, समय तथा रेडियो फ्रीक्वेंसी के अनुकूल इनमें से किसी भी भाषा में समाचार और क्रिकेट की कॉमेंट्री सुनते रहे हैं। उम्र के साथ उनकी सुनने की क्षमता में, और फिलिप्स तथा पैनासोनिक जैसी कंपनियों के रेडियो बनाने की क्वालिटी में भले ही गिरावट आई हो, परंतु उनका लगाव यथावत है। रेडियो के साथ तो लगाव ऐसा है कि दो दिन बिना दादी माँ के भले ही रह लें, पर बिना रेडियो के रहना उनके लिये बहुत मुश्किल होता है।
लगभग दस दशकों की ज़िंदगी में उन्होंने यकीनन बहुत कुछ खोया और पाया है, परंतु ज़िंदगी के तमाम खोया–पाया और उलझनों के बीच उन्होंने हमेशा अपने-आप को सुलझाए रखा। बचपन में जब मेरे साथी मुझसे पूछते थे “तुम्हारे आदर्श कौन हैं?” मैं दादाजी का नाम लेता था। और मुझे यकीन है कि अगर यही सवाल मेरे सामने मेरे “चौथेपन” में भी दोहराया गया तो उत्तर अपरिवर्तित रहेगा।
मेरे दादा का बचपन मेरे जैसा तो नहीं था,
मैं चाहूँगा मगर अपना बुढ़ापा उनके जैसा।
आज ५ नवंबर को पितामह का जन्मदिन है और मैं ईश्वर से कामना करता हूँ कि दादाजी को स्वस्थ, समर्थ और दीर्घायु रखे।
पितामह को जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! 🎂🎉
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