Saturday, 28 February 2026

लाइटहाउस

साल का सबसे छोटा महीना होता है दूसरा महीना। यह जानता हूँ, फिर भी इस बार समय छोटा नहीं लगा। जनवरी कब आई और कब चली गई, ठीक-ठीक याद नहीं। उँगलियों पर गिनूँ तो बस कुछ दृश्य बचते हैं - सिक्किम के शुरुआती दिन, पुस्तक मेले की किताबें और मुलाक़ातें, और बीच-बीच में ऑफिस और घर के वर्कस्टेशन पर बीतते घंटे। स्मृति ने जनवरी को बस इतने ही फ्रेम्स में सँजोया है।


कहीं पढ़ा था कि इस साल की फ़रवरी अलग है। रविवार से शुरू होकर शनिवार पर ख़त्म होते हुए, इस महीने में सप्ताह के सातों दिन चार-चार बार आएँगे। एकदम पिक्चर-परफेक्ट महीना। निजी तौर पर, पहले सप्ताह में शादी की सालगिरह आती है। उसी के आसपास लगभग नौकरी का अप्रेज़ल लेटर भी। कुल मिलाकर, आमदनी और ख़र्च का संतुलन बना रहता है।



राँची, 2011


एग्जाम कैसा गया?

अच्छा गया।

पार्टी दो फिर!

चलो।


बारहवीं का बोर्ड एग्जाम शुरू हुआ था। एक दूर के दोस्त ने परीक्षा अच्छे होने की पार्टी माँगी और पार्टी दे भी दी गई। वैसे भी, दोस्त कभी कुछ माँगे तो मना नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह वही माँगता है जो तुम दे सकते हो। इस बार बारी मेरी थी।


लौटने में स्कूटी हम चलाएँगे।

चलानी आती है?

हाँ, आती है। चाभी दो।

रुको, भीड़ से निकाल देते हैं, फिर चलाना तुम।

अरे, निकाल लेंगे हम। बेवजह लोड मत लो।


पीछे दोस्त को बैठाकर हम भीड़ से निकलकर खाली सड़क पर आ गए थे। हॉस्टल सीधे हाथ की तरफ लगभग सौ-दो सौ मीटर की दूरी पर था। स्कूटी हॉस्टल की तरफ मोड़ी। लगभग तीस फीट चौड़ी सड़क पर सामने से आ रही एक और स्कूटी को देखकर पीछे बैठा दोस्त चिल्लाया, “अरे, ठोक मत देना!”


मैं देख रहा था कि दोनों स्कूटियों के बीच इतनी दूरी है कि बीच से एक ट्रक आसानी से निकल सकता है। आँखें अब भी सामने देख रही थीं, पर उसकी आवाज़ में इतनी उत्तेजना थी कि कान भटक गया और भटके कान ने क्षण भर के लिए दिमाग़ को भी भटका दिया। एक हादसे के लिए इतना समय काफ़ी था। आँखें अब भी सामने देख रही थीं, पर सामने सड़क नहीं थी—सड़क के किनारे का एक पेड़ था। सड़क और इस पेड़ के बीच एक नाली थी—सरकारी दुर्व्यवस्था के बदौलत धूल-मिट्टी से भरी हुई सूखी नाली।


दिमाग़ ने हाथ को सिग्नल भेजा—एक्सलरेटर नहीं, ब्रेक लगाओ। पेड़ से टकराए तो जान भी जा सकती है। अभी कुछ महीने पहले परिवार में एक हादसा हुआ था। हाथ ने दिमाग़ के सिग्नल का अक्षरशः पालन किया। तीस-चालीस की रफ़्तार से चलने वाली स्कूटी अचानक रुकी। मोमेंटम संरक्षित रहा। स्कूटी दाहिनी तरफ गिरी। हम दोनों गिरे। दोस्त पहले उठा, फिर स्कूटी उठाई और आख़िर में मुझे।


मैं उठा। घुटनों और कोहनियों में सड़क किनारे की नुकीली बजरी अंदर तक घुसी हुई थी। सड़क ने यह बजरी और धूल मुझे मेरे खून के बदले उधर दी थी। मैं खुश था कि पेड़ से नहीं टकराया। टकराता तो शायद ज़िंदा नहीं रहता।


कदम बढ़ाने की कोशिश की, ताकि हॉस्टल तक जा सकूँ। बटुए में जितने पैसे थे, उनकी पार्टी दे चुका था। जेब में दादाजी का दिया हुआ एटीएम कार्ड था, पर उसमें उतने पैसे नहीं थे कि सीधे अस्पताल जा सकूँ। दोस्त ने स्कूटी उठाई, स्टार्ट किया और पीछे बैठाकर हॉस्टल तक छोड़ा। उसकी स्कूटी को भी नुकसान पहुँचा था। उसकी इच्छा थी कि उसके नुक़सान की भरपाई पहले कर दी जाए। स्कूटी, जिसे वह अभी तक अपना बता रहा था, दरअसल किसी और की थी।


मैं हॉस्टल पहुँचकर अपने रूममेट को बाहर बुलाया। उससे पाँच सौ रुपये उधार लिए और साथ आए लड़के को दिए। उसने पैसे लिए। उसके हिसाब से पाँच सौ कम थे, पर मेरी स्थिति उसे उस वक़्त इससे ज़्यादा रुपये देने की नहीं थी। वह अपनी उदासी मेरे पास छोड़कर अपने हॉस्टल चला गया।


उसके जाते ही मैं अपने रूममेट के साथ पास के क्लिनिक के लिए निकला। खून निकल रहा था, पर मैं अब भी चल पा रहा था। हॉस्टल से थोड़ी दूर चलने पर एक ऑटो-रिक्शा लिया। फर्स्ट एड के बाद एक्स-रे हुआ। अच्छी बात यह थी कि कुछ टूटा-फूटा नहीं था। ज़ख्म गहरे थे। डॉक्टर ने ड्रेसिंग की, दवाइयाँ लिखीं, अगले कुछ दिनों तक ड्रेसिंग करवाने की सलाह दी और बोर्ड एग्जाम के बीच किशोरावस्था की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकत के लिए थोड़ी-बहुत फटकार के साथ विदा किया।


जो पैसे लगे, वे रूममेट ने दिए। बचपन से ही डाँट खाने की आदत नहीं रही। कभी ऐसा कुछ किया नहीं कि घरवालों को या फिर स्कूल में शिक्षकों को मुझे डाँट-फटकार लगाने की ज़रूरत पड़ी हो। घुटने और कोहनियाँ तो चोट की वजह से पहले ही भारी थे, अब अस्पताल से निकलने के बाद मन भी भारी हो गया। लगा कि घर से दूर रहना कितनी वाहियात चीज़ है। जिन्हें फटकार लगानी चाहिए थी, वे पास नहीं हैं; उन्हें ख़बर तक नहीं है, और यहाँ पूरा शहर ही गार्जियन बना हुआ है।


पहले ऑटो वाले अंकल ने अपने हिस्से का ज्ञान दिया, फिर फर्स्ट एड करते हुए नर्स ने, ज़ख्म देखते और ड्रेसिंग करते हुए डॉक्टर ने। अभी जब हॉस्टल वार्डन को ख़बर मिलेगी, तो वह भी अपने हिस्से का ज्ञान देंगे। फिर बाकी का ज्ञान बचे हुए चार परीक्षाओं में परीक्षा-निरीक्षकों से भी मिलेगा। एक दिन के अंतराल पर परीक्षा भी है।


भारी मन से दोबारा घर फ़ोन करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा था। एग्जाम हॉल से निकलते ही घर फ़ोन करके बता चुका था कि परीक्षा सही हुई है। अब दोबारा फ़ोन करने पर घरवाले ज़रूर पूछते कि क्या हुआ। जवाब देते हुए मुझसे झूठ बोला नहीं जाता, और सच बताने की स्थिति में मैं बिल्कुल भी नहीं था।


मन ही मन यह फैसला लिया कि जो भी हो, अभी घर पर कुछ नहीं बताऊँगा। इस एक्सीडेंट का वित्तीय हिस्सा कहीं और से मैनेज कर लूँगा। बाकी बचा शारीरिक और मानसिक—वह तो कोई बाँट नहीं सकता। जिस तरह की शांत और आदर्श बच्चों वाली ज़िंदगी अब तक मैंने जी थी, ऐसे बच्चों से इस तरह की हरकत की उम्मीद कोई नहीं करता। ईर्ष्या रखने वाले पड़ोसी भी नहीं।


ईर्ष्या रखते हुए वे पड़ोसी भी शायद इतना ही सोच पाते होंगे कि मेरे नंबर उनके बच्चों से कम आएँ, या नब्बे प्रतिशत की जगह मैं अस्सी के नीचे रह जाऊँ। यही सब सोचकर अपराध-बोध लगातार बढ़ता जा रहा था।


हॉस्टल पहुँचा। दवाइयाँ लीं। फ़ोन चार्ज किया और नंबर ढूँढ़ने लगा। सोचने लगा कि किसे फ़ोन करूँ, जो वह समझ सके जो मेरे ज़ेहन में चल रहा है। जिससे इस घटना का एंड-टू-एंड विवरण सच-सच बताकर मन हल्का कर सकूँ; अपनी गलती मान सकूँ कि स्कूटी को साइकिल चलाने जितना आसान मानना मेरी भूल थी।


वर्तमान मनःस्थिति में दर्द तो सहा जा सकता है, पर इस मन से तीन-चार परीक्षाएँ लिख पाना कठिन होगा। शुरुआत से ही कम फ़ोन करने की आदत रही है। छोटे मामा से अपनी बातें कह सकता था, पर कुछ महीने पहले एक रोड एक्सीडेंट ने उनकी जान ले ली। वे मेरे लाइटहाउस थे।


एक दोपहर की प्रचंड धूप में मोटरसाइकिल चलाते वक्त उन्हें शायद चक्कर आया। उनकी गाड़ी सड़क से उतरकर एक पेड़ से टकराई और उस क्रूर और निर्दयी दोपहर ने मेरे लाइटहाउस से रोशनी निकालकर हमेशा-हमेशा के लिए अँधेरा भर दिया।


कॉन्टैक्ट लिस्ट इतनी छोटी थी कि चार-पाँच बार स्क्रॉल कर लिया। अंततः एक नंबर पर कॉल करने का फैसला लिया। कॉल करके उन्हें सब सच-सच बता दिया। उनसे घर पर कुछ भी नहीं बताने का अनुरोध करते हुए कुछ पैसे भेजने को कहा।


मेरी स्थिति और समझ उतनी नहीं थी कि उनसे उनका कुशल-क्षेम पूछ सकूँ। उस पूरे दिन और शायद अगले पंद्रह-बीस दिनों में वे इकलौते इंसान थे, जिन्होंने इस घटना पर कोई टिप्पणी नहीं की। उन्होंने पैसे भेज दिए। घर पर भी तब तक नहीं बताया, जब तक मैं ठीक नहीं हो गया।


अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो टक्कर की आवाज़ नहीं, एक गहरी खामोशी सुनाई देती है। जैसे भीतर कुछ टूटकर बिखरा नहीं, बल्कि पुनः व्यवस्थित हो गया हो। सड़क के किनारे खड़ा वह पेड़ सिर्फ़ एक पेड़ नहीं था - वह एक सीमा-रेखा था। उसके इस पार मेरा उतावलापन था, उस पार जिम्मेदारी।


स्कूटी गिरते ही जैसे भीतर का एक लाइटहाउस बुझा नहीं, बल्कि उसकी दिशा बदल गई। पहले उसकी रोशनी बाहर रास्ता दिखाती थी; उस दिन के बाद वह भीतर पड़ने लगी। मैंने जाना कि डर हमेशा मरने का नहीं होता, कभी-कभी वह उन लोगों से दूर होने का होता है, जिन्हें सच सबसे पहले बताना चाहिए।


उस शाम मैंने अपने हिस्से का दर्द खुद उठाया, अपने हिस्से का सच खुद सँभाला। शायद वही क्षण था जब बचपन थोड़ा पीछे रह गया और जिम्मेदारी एक कदम आगे आ खड़ी हुई। कुछ लाइटहाउस जीवन में छिन जाते हैं, कुछ दूर चले जाते हैं और कुछ हमें खुद बनना पड़ता है।




गुड़गांव, 2026


आज के हिस्से का कीबोर्ड पीटकर कुछ देर पहले ऑफिस से लौटा हूँ। एक ज़रूरी कॉल बाकी है, जिसे घर से अटेंड करना होगा। एमएनसी की नौकरी ऐसी ही होती है। पिछले दस साल में इसकी आदत हो चुकी है - या शायद हम खुद को यही समझा लेते हैं।


मैनेजर ने बताया है, पौने ग्यारह बजे कनेक्ट करना है। कल सुबह छह बजे की ट्रेन है - नई दिल्ली स्टेशन, प्लेटफ़ॉर्म नंबर सोलह। सामान पैक करना बाकी है। दो दिन के कपड़े रखने हैं; बीस मिनट काफ़ी होंगे। एक शादी भी अटेंड करनी है। 11:40 तक पैकिंग पूरी कर ली। लैपटॉप पर नोटिफिकेशन चमकता है। कॉल शुरू होने से पहले मन ही मन सोचता हूँ - बारह से पहले ख़त्म हो जाए।


डिस्कशन शुरू होता है। पूरे साल का लेखा-जोखा। अप्रैज़ल कॉल- जहाँ मेहनत, “अबव एंड बियॉन्ड” उठाई गई ज़िम्मेदारियाँ और अनगिनत ओवरटाइम एक नंबर में सिमट जाते हैं। साफ़ शब्दों में कहूँ तो साल भर के कर्मों का फल तय होता है।

गीता में कृष्ण कहते हैं- कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

कृष्ण अगर कॉर्पोरेट में होते, तो शायद यह पंक्ति फुटनोट में चली जाती।


कॉल के बीच पीछे का दरवाज़ा खुलता है और फिर बंद हो जाता है। घड़ी देखता हूँ, बारह बज चुके हैं। तारीख़ बदल गई है। आज हमारी शादी को चार साल हो गए।


प्रज्ञा के लिए एक गिफ्ट दूसरे कमरे में रखा है। एक कार्ड भी है, खाली। शादी से पहले उसके जन्मदिन पर तीस मिनट में दो पन्नों का ख़त लिख दिया था। आज दो लाइन नहीं लिख पाया। समय की कमी धीरे-धीरे अपराधबोध में बदल जाती है। न चाहते हुए भी उसी बिरादरी में खड़ा दिखता हूँ - जहाँ प्रेम के लिए समय नहीं बचता।


फ़ोन बजता है। मम्मी हैं। जानता हूँ, सालगिरह की बधाई के लिए होगा। ऑफिस कॉल पर हूँ, इसलिए उठाता नहीं। सोचता हूँ, पाँच मिनट में बात कर लूँगा। बाहर जाकर प्रज्ञा से मिलूँगा। कार्ड पर कुछ लिख दूँगा। रात के बारह बजे भी मैं घड़ी से आगे निकलने की कोशिश कर रहा हूँ।


कॉल ख़त्म होती है। डिस्कशन उम्मीद के मुताबिक रहा। शायद अगला पे-चेक अब तक का सबसे बड़ा हो। गिफ्ट लेने दूसरे कमरे में जाता हूँ। लौटता हूँ तो देखता हूँ, वैसा ही एक बैग प्रज्ञा के हाथ में भी है। हम दोनों ने एक-दूसरे से छुपाकर तोहफ़े खरीदे हैं। मैं पहले तोहफ़े खरीदने वालों में नहीं था। अब हूँ। पैसे बहुत जगह खर्च हो सकते हैं, भावनाएँ नहीं।


हम एक-दूसरे को सालगिरह की शुभकामनाएँ देते हैं। तोहफ़े बदलते हैं। मैं उसे कॉल का संक्षिप्त विवरण बताता हूँ। हम दोनों खुश हैं- थोड़ा भविष्य के लिए, थोड़ा एक-दूसरे के लिए। इसी बीच मम्मी को फ़ोन करता हूँ। मेरे एक प्रणाम पर चार आशीर्वाद मिलते हैं। बात ख़त्म करने लगता हूँ तो उनकी आवाज़ हल्की-सी काँपती है।


मैं पूछता हूँ, क्या हुआ?

वह एक अस्पताल का पता बताती हैं। कहती हैं, एक बार जाकर देख लो। बाहर आकर प्रज्ञा को बताता हूँ। एक्सीडेंट हुआ है। साफ़ जानकारी किसी के पास नहीं है। मुझे जाना होगा।


टैक्सी दो मिनट में आ जाएगी। अस्पताल दस मिनट दूर है।


शादी की चौथी सालगिरह और सबसे बड़े पे-चेक की ख़ुशी - सिर्फ़ आठ मिनट। सोफ़े पर गुलदस्ता वैसे ही रखा है। ग्रीटिंग कार्ड अब भी खाली है। घर की लाइटें जल रही हैं। और हम दरवाज़ा बंद कर रहे हैं।


दस मिनट का रास्ता बहुत लंबा हो गया है। सेकंड मिनट में बदल रहे हैं। रात के एक बजने को है, लेकिन शहर इस कदर जगा हुआ है मानो दोपहर हो। हज़ार बातें ज़ेहन में उठती हैं- हादसा कब, कैसे, कहाँ हुआ और कितना नुक़सान हुआ। फ़ोन पर जो घबराहट थी, दिमाग़ साफ़ नहीं सोच पा रहा। नकारात्मक विचारों को दबाने की कोशिश करता हूँ, पर वे लौट आते हैं।


मम्मी ने फ़ोन रखते हुए बताया था कि विमल को पुलिस अस्पताल छोड़ गई है। विमल उनके मंझले भाई हैं। उनके बच्चों को ज़्यादा जानकारी की उम्मीद में फ़ोन करता हूँ। उधर आवाज़ों में और भी बेचैनी है। स्थिति और भारी लगने लगती है।


कुछ देर सड़क ख़ाली मिलती है और ड्राइवर गाड़ी तेज़ करने लगता है। मैं उसे रोकता हूँ। एक हादसे के बीच दूसरा हादसा झेलना मुश्किल होगा।


सड़क से हॉस्पिटल का बोर्ड दिखता है, पर वहाँ तक पहुँचने का रास्ता लंबा है। एक शॉर्टकट दिखती है, पर गाड़ी नहीं निकल सकती। मैं टैक्सी रोककर उतर जाता हूँ। नकारात्मक ख़याल साथ उतरते हैं, पीछा नहीं छोड़ते। अपने को हर स्थिति के लिए तैयार करता हुआ अस्पताल के अंदर जाता हूँ।


रिसेप्शन से जानकारी लेता हूँ। वे एक कमरे की ओर इशारा करते हैं। दरवाज़े तक पहुँचकर देखता हूँ, दर्द से कराहता एक आदमी एक्स-रे टेबल पर सीधा लेटा है। एक पैर सीधा, दूसरा घुटनों से मुड़ा हुआ, टेबल पर त्रिकोण बनाता हुआ। सीधे पैर पर पट्टी बँधी है, पर ख़ून रिस रहा है। चेहरा कंबल से ढका है। कंबल हटाता हूँ, मेरे मामा आधी बेहोशी में कुछ बड़बड़ा रहे हैं। आवाज़ सुनकर राहत मिलती है। सिर सही-सलामत है।


वापस रिसेप्शन पर पूछता हूँ - चोट कहाँ लगी है? डॉक्टर क्यों नहीं है? इलाज शुरू क्यों नहीं हुआ? सवाल करते हुए स्वर ऊँचा हो जाता है। जवाब में वह क्यूआर कोड आगे बढ़ाता है और कहता है,

“इस पर दो हज़ार ट्रांसफ़र कर दीजिए। डॉक्टर बीस मिनट में आ जाएँगे।”


मेरे पास कहने को कुछ नहीं था। पैसे ट्रांसफ़र कर दिए। काउंटर पर लगा पेमेंट डिवाइस बच्चन साहब की आवाज़ में ट्रांज़ैक्शन पूरी होने की सूचना देता है। डॉक्टर को फ़ोन चला गया है।


मैं भी फ़ोन निकालता हूँ। कई मिस्ड कॉल हैं। जहाँ ज़रूरी लगा, वहाँ ख़बर कर दी - स्थिति फ़िलहाल ख़तरे से बाहर है।


वापस एक्स-रे रूम में जाता हूँ। मामा को आवाज़ देता हूँ। पहचान लेते हैं। धीरे-धीरे बोलते हैं - बहुत ठंड लग रही है। कोई सुन नहीं रहा। डॉक्टर अभी तक क्यों नहीं आया? मुझे कहीं और ले चलो। यहाँ डॉक्टर नहीं है। ऑफिस फ़ोन कर देना, कल नहीं आ पाऊँगा।


वे बार-बार यही कहते हैं। सोचता हूँ - लोगों का घर भले छूट जाए, पर काम से कभी छुटकारा नहीं मिलता।


उनका फ़ोन उठाता हूँ। जेनेरिक-सा पैटर्न लॉक है। दो नाम बताते हैं। नंबर ढूँढकर कॉल मिलाता हूँ। मालूम है, रात के डेढ़-दो बजे कोई नहीं उठाएगा। फिर भी उनके सामने कॉल लगा देता हूँ।


ठंड की शिकायत करता हूँ। हीटर लगा दिया जाता है। वही हीटर, जो पहले से स्विच्ड ऑफ़ किया हुआ वहीं पड़ा था।


एक्स-रे रूम के बाहर कुर्सी खींचकर बैठ जाता हूँ। आसपास कुछ परिचित चेहरे हैं, कुछ अपरिचित। लोग सलाह देते हैं - कहीं और ले चलते हैं।

मैं पूछता हूँ—कहाँ?

सलाह सबके पास है, जवाब किसी के पास नहीं।


पच्चीस मिनट हो चुके हैं। रिसेप्शन पर जाता हूँ। इतने में डॉक्टर अंदर आ जाते हैं। नर्सों को एक्स-रे की हिदायत देकर भीतर चले जाते हैं।


रिपोर्ट के बाद बताते हैं- पैर की हड्डी और कॉलर बोन में फ्रैक्चर है। पैर की चोट गंभीर है। सर्जरी करनी होगी। एडमिट करना पड़ेगा।


मैं खर्च पूछता हूँ। वे बीमा पूछते हैं।


मुझे नहीं मालूम कि मामा जी का हेल्थ इंश्योरेंस है या नहीं। डॉक्टर से इलाज शुरू करने को कहता हूँ। वे कुछ निर्देश देते हैं। इतने में रिसेप्शन से ब्लैंक एडमिशन फॉर्म थमा दिया जाता है—भरकर पैसे के साथ जमा करने को।


तब तक उनके दोनों बच्चे पहुँच जाते हैं। घबराए हुए। उन्हें स्थिति बताता हूँ। हौसला रखने को कहता हूँ। इंश्योरेंस के बारे में पूछता हूँ - किसी को कुछ पता नहीं।


मामा जी का फ़ोन अब भी मेरे पास है। उसमें उनके ऑफिस का एक एप्लीकेशन मिलता है। थोड़ी तलाश के बाद हेल्थ कार्ड दिख जाता है। बाकी ज़रूरी काग़ज़ भी वहीं मिल जाते हैं। मांगी गई रकम और काग़ज़ात के साथ फॉर्म जमा कर देता हूँ।


इंजेक्शन लग चुके हैं। ड्रेसिंग हो गई है। उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। कल शाम तक मॉनिटर करेंगे, फिर शायद सर्जरी। धीरे-धीरे लोग लौटने लगते हैं। उनके साथ उनका बेटा रुकेगा। उसके हिस्से में पहली बार ऐसी मुश्किल रात है। 


घड़ी तीन बजा रही है।

अगर सुबह की ट्रेन पकड़नी है, तो अब मुझे भी लौटना होगा।


वार्ड में जाता हूँ।

मामा जी अब होश में हैं।


मुझे देखते ही उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आती है- जैसे दर्द के बीच किसी ने आश्वासन रख दिया हो। मैं उनके पास कुर्सी खींचकर बैठ जाता हूँ।


“डर गए थे?”


मैं पूछता नहीं, बस उनकी आँखों में देखता हूँ।


वे धीमे से कहते हैं, “तू आ गया… अब ठीक है।”


यह वही वाक्य है, जो कभी मैंने मन-ही-मन किसी से सुनना चाहा था। 2011 में, हॉस्टल के उस कमरे में, जब घुटनों में बजरी धँसी थी और मन में अपराध-बोध। उस दिन मैंने अपने हिस्से का डर अकेले उठाया था। आज शायद किसी और के डर का थोड़ा हिस्सा मेरे हिस्से में आया है।


मैं उन्हें डॉक्टर की बताई बात बताता हूँ। एक सर्जरी करनी होगी, फिर सब ठीक हो जाएगा।

वे सिर हिलाते हैं। कुछ कहना चाहते हैं, पर दवाइयाँ शब्दों को धीमा कर देती हैं।


उनका बेटा पास खड़ा है। उसकी आँखों में वही घबराहट है, जो कभी मेरी रही होगी। मैं उसके कंधे पर हाथ रखता हूँ। उसे आश्वासन देता हूँ, जैसे कभी किसी ने मुझे दिया था- बिना किसी टिप्पणी, बिना किसी फटकार के।


अस्पताल की रोशनी अजीब होती है -सफ़ेद, तीखी, नींद और विचार दोनों छीन लेने वाली। पर उसी रोशनी में मुझे साफ़ दिखता है - लाइटहाउस कभी अचानक नहीं बुझते। वे बस अपना स्थान बदल लेते हैं।


पंद्रह साल पहले मामा जी ने दो हज़ार रुपये भेजे थे, बिना सवाल पूछे। आज मैंने उतनी ही राशि क्यूआर कोड पर ट्रांसफ़र की है। जीवन कभी-कभी इतनी सटीक गोलाई में लौटता है कि हिसाब बराबर नहीं, अर्थ पूरा हो जाता है।


वे आँखें बंद किए ही मुझसे कहते हैं, “रात बहुत हो चुकी है। तुम भी घर चले जाओ।”


मैं अस्पताल से बाहर निकलकर सड़क तक आता हूँ। एक बस स्टॉप बना हुआ है। मैं वहीं खड़ा होकर टैक्सी का इंतज़ार करने लगता हूँ। नज़र बस स्टॉप की बेंच पर जाती है - कुछ सामान रखा हुआ है। नज़रें नीचे करके देखता हूँ - एक आदमी सोने की कोशिश कर रहा है।


इंतज़ार करते हुए याद आता है- घर में ग्रीटिंग कार्ड अब भी खाली है। लौटकर उस पर कुछ लिखने का समय नहीं बचेगा। वैसे भी उसके खाली पन्नों पर जो लिखना था, समय लिख चुका है।


टैक्सी में बैठते ही शहर फिर वही हो जाता है- रोशनी, ट्रैफ़िक, शोर। आते वक़्त की घबराहट को याद करते हुए ख़ुद को आश्वस्त करता हूँ - यह स्थिति बेहतर है।


2011 याद आता है। समय पर वहाँ पहुँच पाना, जहाँ तुम्हारा होना फ़र्क़ करता हो - वाक़ई बहुत ज़रूरी चीज़ है।


सुबह की ट्रेन छह बजे है। पकड़ने के लिए चार बजे तक घर से निकलना होगा। ईश्वर से दुआ करता हूँ कि मेरी आज की नींद किसी और को दे दे।


- रीतेय 

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