आज नींद जल्दी खुल गई। घड़ी देखी तो सुबह के पाँच बज रहे थे। साढ़े दस-ग्यारह बजे जागने वालों के लिए यह सचमुच बहुत जल्दी था, लेकिन यह शहर भी दूसरा है, तो यहाँ की गतिविधियों को अपने शहर के मापदंड पर तौलना ठीक नहीं होगा। होटल से निकला। गलियों में सौ-डेढ़ सौ मीटर चलने के बाद सामने गंगा दिखने लगी। कुछ देर वहीं खड़े होकर देखता रहा। अपने वास्तविक फैलाव के एक चौथाई हिस्से में बहती हुई गंगा अब भी विहंगम और मनोरम है। दूसरे किनारे पर बहुत दूर तक रेत की सफेद चादर बिछी हुई है और उसके बाद थोड़ी-बहुत हरियाली, फिर ऊपर आसमान। कुछ छोटी, कुछ बड़ी नावें धारा को चीरती हुई दोनों दिशाओं की ओर बढ़ती जा रही हैं। इनमें सवार लोग यक़ीनन मुझसे पहले जगे होंगे।
मैं जहाँ खड़ा हूँ वहाँ से गंगा लगभग पचास-पचपन सीढ़ी नीचे है। मैं दस-बारह सीढ़ियाँ नीचे उतरकर बैठ जाता हूँ। आसमान में लालिमा बढ़ने लगी है। अब शीघ्र ही सूरज निकलेगा और अपनी लाली से गंगा की सतह को अपने रंग में रंग देगा। मैं प्रतीक्षारत हूँ और नज़रें नीचे कर देखता हूँ तो और भी बहुत से लोग हैं जो इसी क्षण के इंतज़ार में हैं। कुछ के हाथों में कैमरा है, कुछ के हाथों में किसी और का हाथ। कुछ हाथों में कुछ भी नहीं है। वे हाथ, जिनमें कुछ भी नहीं है, सबसे ज़्यादा एकाग्रचित्त हैं।
ऊपर से देखने पर सामने एक गोल चबूतरा दीखता है। बिल्कुल लाल रंग में रंगा हुआ। एक युगल उस चबूतरे की ओर बढ़ता है और चप्पल उतारकर ऊपर बैठ जाता है। उन दोनों के आपसी सामंजस्य को देख कर प्रतीत होता है कि उनके बीच स्नेह रूपी सूर्य का उदय पहले ही हो चुका है। साथ में सूर्योदय देखकर वे दोनों संभवतः नेह के इस बंधन को और प्रगाढ़ करने की कोशिश कर रहे हैं। वह चबूतरा संभवतः एक मंदिर है, जिसके ऊपर आदमी को जूते-चप्पल उतारकर बैठने की आज़ादी है। कुत्ते-बिल्लियों पर इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। यह क्या ख़ूब अदा है बनारस की, ईश्वर अपने चाहने वालों को सिर पर बिठाने में कतई संकोच नहीं करता।
एक और जोड़ा उधर से अभी-अभी गुज़रा है। इनके बीच स्नेह का सूर्योदय होने में शायद कुछ वक़्त लगेगा। दोनों के चेहरे ढके हुए हैं। सिर्फ़ आँखों पर पर्दा नहीं है। यह पर्दा संभवतः सूरज और समाज के ताप से बचने के लिए लगाया गया होगा। लड़का आगे चल रहा है और उसका एक हाथ पीछे है, जिसे लड़की ने पकड़ा हुआ है। घाट पर चलते हुए युवती को कुछ एहसास होता है और वह झट एक हाथ से फ़ोन निकाल कर दूसरे हाथ की तस्वीर खींच लेती है। लड़के को इसका अंदाज़ा नहीं है। वह अब भी एक सुरक्षित जगह तलाश करने में व्यस्त है।
सूर्योदय हो चुका है और उसके साथ ही गंगा की सतह अब पूरी तरह रंग चुकी है। अब धीरे-धीरे धूप की कोमलता कर्कशता में परिणत होने लगेगी। नज़रें थोड़ी और नीचे करता हूँ। पाँच लड़के गंगा में स्नान करते नज़र आते हैं। एक लड़का अभी-अभी बाहर आ गया है। बाक़ी बचे चार में से एक तैरना सीख रहा है। उसने बगल की किसी नाव से लाइफ जैकेट निकाल लाया है और उसे शरीर के अलग-अलग हिस्सों में लगाकर तैरने की कोशिश कर रहा है। एक को तैरना आता है, पर उसकी संतुष्टि तैरने में नहीं है। वह बार-बार बगल की नाव से कूदकर गोताखोरी सीख रहा है। तीसरे को मात्र डुबकी लगाने भर से मतलब है। चौथे का खेल इन सबसे बिल्कुल अलग है। वह डूबने की एक्टिंग कर रहा है। उसकी इच्छा संभवतः एक वायरल रील बनाने की है।
मैं जिस सीढ़ी पर बैठा हुआ हूँ, उसके ठीक ऊपर एक मंदिर है। कुछ देर पहले वहाँ कोई सो रहा था। अब कुछ और लोग वहाँ आ गए हैं। मंदिर से एक आदमी बाल्टी लेकर पचास-पचपन सीढ़ी नीचे उतरता है। बाल्टी भर गंगाजल लाकर मंदिर की सफाई करता है। बाल्टी का गंगाजल अब गंदाजल हो चुका है। वही आदमी बाल्टी लेकर नीचे उतरता है और निःसंकोच उस बाल्टी को गंगा में उड़ेल देता है। गंगा, जो पहले ही मटमैली है, उस जगह थोड़ा और धुँधला उठती है। यह वह ज़ख्म है, जिसे गंगा को स्वयं भरना होगा। आदमी वहाँ से हटकर थोड़ी दूर जाता है, बाल्टी धोता है और पवित्र गंगाजल लेकर ऊपर लौट आता है। उसके ऊपर लौटने तक गंगा उस गंदगी को अपने में समाहित कर लेती है। अपने किनारे पर नगरों को बसा कर गंगा ने सदियों से यही काम किया है। मानवता की अपवित्रता समेटते-समेटते आज गंगा की पवित्रता खतरे में है।
यहाँ अब तक जो घटा है, वह पिछले एक-आध घंटे में घटित हुई बनारस के एक घाट की घटना है। धूप अब कर्कश लगने लगी है। मैं वापस होटल लौटने की तैयारी करने लगा हूँ। मैं वहीं से पंद्रह सीढ़ी चढ़कर वापस लौटना चाहता हूँ, पर अंदर कुछ है जो मुझे पैंतीस सीढ़ी नीचे खींच ले जाता है। मैं नीचे उतरता हूँ, चप्पल उतारकर गंगा का पानी हाथ में लेता हूँ और दोनों हाथ जोड़कर सूरज की ओर देखते हुए अर्पित कर देता हूँ। जो हाथ में रह जाता है, उसे अपने ऊपर छिड़क लेता हूँ, यह जानते हुए कि वाराणसी में गंगाजल गुणवत्ता की दृष्टि से अपने निम्नतम स्तर पर है।
— रीतेय
बनारस की आत्मा और गंगा की वेदना ,दोनों को बेहद गहराई से महसूस कराया
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद। 🙏🏻
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