Thursday, 10 October 2019

राम की नयी समस्या - (व्यंग्य) - Reetey (रीतेय)

स्वर्गलोक में भगवान विष्णु का दरबार सजा है। अपने अलग अलग अवतारों के फलस्वरूप  वो प्रतिदिन अलग अलग अवतारों में कुछ देर के लिए चले जाते हैं और उन अवतारों से जुड़ी समस्याओं के समाधान में जुट जाते हैं। आज बारी रामराज्य की थी। वैसे तो कांड उन्होंने कृष्ण-अवतार में ज़्यादा किया है परंतु धरती पर जब से कोलाहल बढ़ा है, कृष्ण-अवतार से  कहीं ज्यादा वक्त तक भगवान को रामावतार में रहना पड़ता है।

सभा आरंभ हुई। सभासद वैसे ही विराजमान हैं जैसे कि रामराज्य में हुआ करता था। राम, बगल में जानकी फिर अगल-बगल लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न एवं बाकी सभासद। खुशी की बात यह है कि, आखिरकार राम के साथ सीता भी सभा की हिस्सा हैं। कुल मिलाकर सभा वैसी ही है जैसा की संजय लीला भंसाली के फिल्मों में होता है।




सब थे बस हनुमान नज़र नहीं आ रहे थे। नज़र न आने की वजह ये थी, कि हनुमान बाक़ी सभासदों से अलग अमरत्व की प्रताड़ना झेलने के लिए धरती पर छोड़ दिए गए थे। ऐसी बात नहीं थी कि हनुमान अब राम की सभा में नहीं जाते थे, पर जब भी जाते थे सिर्फ़ राम जन्मभूमि वाले मुद्दे की अपडेट लेकर। राम के नाम पर और कुछ चल भी तो नहीं रहा है धरती पर !

पिछली बार वो सभा में 2014 के आस पास देखे गए थे। फिर 2015 से अब तक उनकी उपस्थिति वैसी ही रही है जैसे की राज्यसभा में मनोनीत सिलेब्रिटीज़ की होती है। उदाहरण के तौर पर आप हनुमानजी की तुलना माननीय सचिन से भी कर सकते हैं। मैं बस राज्यसभा में उपस्थिति की बात कर रहा हूँ ।

सभा आरंभ होते ही भारत ने उत्सुकतावश पूछा, भैया आपने ग़ौर किया है, हनुमान को सभा में आए हुए कई साल हो गए हैं। आपको उनकी ख़बर लेनी चाहिए। मुझे मालूम है की आपको अयोध्या वाले मामले में अब कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन फिर भी.... टुकड़ा कोई और दिलवा रहा हो तो लेने में क्या आपत्ति है।

वो दिन गए कि आप लंका जीतकर विभीषण को सौंप आये। वैसे भी उस टुकड़े के लिए न तो हमारा राजकोष ख़ाली हो रहा है और न ही हमारे सभासदों को कोई परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

समझ लिजिए कि बर्थडे गिफ्ट है। आपको याद है अयोध्या वाले मामले की वजह से आपके भक्तों की संख्या में अचानक से बढ़ोतरी हुई थी। अतः मेरे समझ के अनुसार आपको अयोध्या मामले को हल्के में नहीं लेनी चाहिए। 

राम जी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। रामजी को शांत देख लक्ष्मण बीच में बोल उठे, भैया भरत भाई साहब का कथन सर्वथा उचित है। अयोध्या मामले में आपको दिलचस्पी हो या न हो पर हमें है। हमारा बचपन जुड़ा है यार वहाँ से!

आप कैसे भूल सकते हैं वो सारे दिन (हैस टैग ओल्ड मेमोरिज, #बचपन की यादें #वनवास with सीता एंड ब्रो लक्ष्मण)। ये सब कुछ अयोध्या से ही शुरू हुई थी ।
मातृभूमि की अवमानना? जन्मभूमि से जिरह? आपने सोच भी कैसे लिया? आर्य, ख़ुशक़िस्मत हैं आप की अब आर्यावर्त में नहीं हैं, अगर होते हो मातृभूमि को इस तरह नज़रंदाज़ करने पर देश निकला दिया जाता वो भी अकेले !

राम जी बोले, वैसे मुझे अभी भी अयोध्या वाली ज़मीन में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन मैं लक्ष्मण की ‘बचपन की यादों’ वाली बातों से सहमत हूँ। मंत्रीवर सुमंत के माध्यम से हनुमान को संपर्क किया जाए

हनुमानजी से संपर्क सफल रहा। हनुमान जी सूचना मिलते ही चल पड़े और समयानुसार सभा में उपस्थित हुए। परस्पर अभिवादन के उपरांत बोले, प्रभु मैं आने ही वाला था, किन्तु मन में थोड़ी सी शंका थी, कि इतने दिन बाद अचानक से सभा में कैसे जाऊँ। परंतु अपने संदेश भेज कर मेरा कार्य आसान कर दिया। उपयुक्त समय पर मुझे याद करने के लिए शुक्रिया !

हनुमान को इतना औपचारिक देख कर सीता को थोड़ी हैरानी हुई, उन्होंने कुछ व्यक्त करना चाहा परंतु ना जाने क्या सोचकर ये अवसर भी उन्होंने मार्यदपुरूषोत्तम को दिया ताकि वो अपनी बात कह पाएँ ।

हनुमान को हतप्रभ देख, जानकिवल्लभ ने पूछा- अंजनीपुत्र, तुम्हारी हतप्रभता का मूल क्या है? अयोध्या की समस्या कहीं बढ़ तो नहीं गयी? तुम उसके लिए परेशान ना हो। 

हनुमान जो अपनी बात कहने को तैयार खड़े थे, बोले- प्रभु ! समस्या अयोध्या की नहीं है । लक्ष्मण ने बीच में व्यवधान डालते हुए कहा, ‘ क्या, अयोध्या की समस्या सुलझा दी गयी? बड़े भैया को कोर्ट में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है ?

हनुमान ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, सुलझी नहीं है, लेकिन दूध की तरह गरम कर के ठंडा कर दिया गया है । ज़रूरत पड़ने पर आवश्यकतानुसार फिर से उबला जाएगा! 

खायर, प्रभु, मेरी समस्या कुछ और है। मेरी समस्या का मूल है मेरी ‘जाति परीक्षा’। परीक्षा का नाम सुनते ही सीता से रहा नहीं गया, अचानक बोल उठीं- अर्यपुत्र, ये कौनसी परीक्षा है जो आपने मुझसे नहीं दिलवायी? फिर हनुमान कि तरफ़ देखते हुए पूछा- क्या ये जाती परीक्षा अग्नि परीक्षा से भी कठिन है?

सीता के इस प्रश्न का उत्तर न तो राम के पास था और न ही हनुमान के पास। प्रश्न को निरस्त कर दिया गया।

हनुमान ने अपनी समस्या पर प्रकाश डालते हुए बात आगे बढ़ाई। 

प्रभु, पृथ्वी वासी पिछले कुछ दिनों से मेरी जाति में ज़्यादा रुचि दिखाने लगे हैं। आए दिन सभाओं में मेरी जाति निर्धारित की जा रही है। आपको अपने कृष्ण-अवतार की कर्ण वाली घटना याद है? उससे भी बत्तर स्थिति हो चुकी है मेरी।

मैंने अपनी धर्म और जाति प्रमाण पत्र ढूँढने की अथक कोशिशें की, हिमालय से लंका तक के तमाम पर्वतों पर ढूँढ चुका हूँ... सच कहूँ तो ये काम संजीवनी बूटी ढूँढने से कहीं ज़्यादा कठिन है। दूसरी बात ये है की आपसे मिलने कि पहले मेरी कोई जाति थी नहीं। वैसे भी ये जाति तो इंसानों के द्वारा, इंसानो के अहित में , इंसानो को बाँटने के लिए बनाया गयी थी। मैं तो बंदर था, भगवान होने के पहले!

लक्ष्मण और भरत, इस घटनाक्रमपर तुम्हारी क्या राय है ? राम ने पूछा।
-संजीवनी के बारे में? हाँ, वो हनुमान ने मेरे लिये ही लाया था। शुक्रिया हनुमान!
नहीं, हनुमान की जाति के बारे में । भरत ने समझदारी दिखाते हुए लक्ष्मण को सही प्रश्न से अवगत कराया।

लक्ष्मण ने हनुमान से कहा- हनुमान, तुम अपनी धर्म और जाति वाले कॉलम में ‘हिंदुस्तानी’ क्यूँ नहीं लिख देते? तुम्हारी ज़्यादातर मूर्तियाँ तो भारत में ही है। क्यूँ भरत ब्रो? 

भैया भारत और लक्ष्मण, ये सब फ़िल्मी बातें हैं। 
-मैं ख़ुद को हिंदुस्तानी बताऊँगा तो मेरे नाम पर स्टेट पॉलिटिक्स नहीं हो पाएगा। 
-तो तुम ख़ुद को आंध्रा से अलाइन कर लो ? सबसे ऊँची मूर्ति तो वहीं हैं। 
-लेकिन ज़्यादातर मूर्तियाँ तो नॉर्थ इंडिया  में है। मेरे नाम पर ज़्यदा बिज़्नेस भी नॉर्थ इंडिया में ही है। वहाँ के लोग मुझे साउथ माइग्रेट करने नहीं देंगे। 

वैसे भी ये आपलोगों की भूल है। मुझे धरती पर भेजने से पहले आपको मेरा आधार कार्ड बनवाना चाहिए था!

सभा में चिंता की लहर दौड़ गयी! जन्मभूमि वाले मुद्दे के साथ साथ एक नया मुद्दा! 

राम ज़्यादा चिंतित लग रहें हैं। वजह तो नहीं पता पर शायद ये सोच रहे होंगे कि जंगल में जन्म लिए उनके दोनो बेटों को जेनरल माना जाएगा या अनुसुचित जनजाति (Schedule Tribe)? क्या अगर राम मंदिर बन भी गयी तो उसमें उनके दोनो पुत्रों को अंदर जाने की अनुमति होगी?

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