Sunday, 20 October 2019

जंगल की ख़्वाहिश / रीतेय


दुनियाँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं 'अपना राक्षस'।
महसूस कर रहे हैं कमी,
बीहड़ों के डाकुओं की।
दुनियाँभर के तमाम जंगल।



वक़्त लिया है जंगलों ने,
इस फैसले तक आने में!
तब जाकर समझ पाये हैं
कि क्या हैं मुश्किलें..
इस दुनियाँ में रहकर
अपनी दुनियाँ बचाने में।
दुनियांँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं' अपना राक्षस' ।


अब जंगल को कतई नहीं चाहिए,
शेर सा राजा।
क्योंकि,
शेर ने सीख लिया है सर्कस!
घूम आया है चिड़ियाघर!
और, हो चुका है आदी,
मुफ़्त में मिले माँस का ।
शेर ने कर लिया है
शर्तिया समझौता इंसानों से।
समझौता कि, तुम मुझे राजा कहते रहो
और मैं तुम्हें अपना जंगल लूटने दूँगा ।


जंगल जान गया है ये सच
कि, क्यों बनाया था इंसानों ने,
शेर को जंगल का राजा।
दुनियाँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं 'अपना राजा' ।
दुनियाँभर के तमाम जंगल,
ढूँढ रहे हैं 'अपना राक्षस' ।


जंगल समझ चुका है इन बातों को,
कि नहीं हैं इंसानों को परवाह
अपनी सांसों की।
ख़्वाब, उम्मीद और भावनाओं के साथ-साथ
उसने सीख लिया है बनाना और बेचना
हाइड्रोजन और आक्सीजन। 
कभी साथ साथ तो कभी अलग अलग।
कुछ दिनों में ढूँढ लेगा तरीके -आँधियों के, बारिशों के।

अपने बीचोंबीच या अगल-बगल से
गुजरती सड़कों को देखकर
सहम जाता है जंगल।
इससे पहले कि जंगल
को गुजरना पड़े,
सड़कों के बीच से-
जंगल ढूँढना चाहता है एक राजा!
जिससे भय खाता हो निर्भय इंसान।
दुनियाँभर के तमाम जंगल
ढूँढ रहे हैं 'अपना राजा' ।
दुनियाँभर के तमाम जंगल
ढूँढ रहे हैं 'अपना राक्षस' ।


-रीतेय

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