Tuesday, 26 July 2016

जो तू होती, जो मैं होता...

कभी कभी सोचा करता हूँ ,
मन में  उठती हर बातों को , 
स्याही में काश बदल पाता। 
लिख पाता हर एहसासों को,
पन्नों में जीवन दे पता। 

पलकें बंद किये रहता मैं ,
और सामने तुम  मेरे आती।
आँखें बंद रहे या जागे ,
दूर नहीं पर तुम जाती। 
देखा करती तुम भी मुझे,
कि जैसे मैं सोचा करता हूँ। 
फिर तेरे आँखों की गुस्ताखी 
देख कभी मैं शर्माता। 
सपने और हसीं होती,
जो तू होती, जो मैं होता। 

खुले गगन  के नीचे हम तुम,
बुनते ख्वाब सितारों में।  
कभी कभी खोया करता मैं,
तुम संग मस्त बहारों मे। 
तुम बन जाती पुष्प और मैं,
भंवरा बन तुझपर गाता। 
ये जीवन और हसीं होती,
जो तू होती, जो मैं होता।  

ढूंढा करता मैं भी किसी को,
जब घिर जाता तन्हाई में। 
पा लेता हर बार तुझे मैं,
यादों की गहराई में।    
याद में मेरी तू  खोती , और 
याद तुझे  कर मैं सोता।
ये रातें और हसीं होती,
जो तू होती , जो मैं होता। 

- आनंद राज 'रीतेय'


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