जब शाम की ठंढी धूप,
पेड़ के पत्तों से छनकर तुम तक आ रही होगी।
और अपारदर्शी पर्दा बन तुम्हारी जुल्फें,
रोकती रहेगी कि, कोई किरन मुझ तक न पहुँचे।
जब हरी घास बिस्तर सी होगी,
और असीम ख्वाबों से भरा मेरा सर,
टिकी होगी तुम्हारी गोद में।
तुम्हारी झुकी नजरें, ताक रही होगी मुझको,
और मैं, देखकर तुम्हारी नजरों में,
कुछ कह रहा होउंगा....
मैं इंतजार में हुँ और मेरी अधूरी कविता भी,
जो शायद तुम्हें मिल के पूरी हो जाएगी।
पेड़ के पत्तों से छनकर तुम तक आ रही होगी।
और अपारदर्शी पर्दा बन तुम्हारी जुल्फें,
रोकती रहेगी कि, कोई किरन मुझ तक न पहुँचे।
जब हरी घास बिस्तर सी होगी,
और असीम ख्वाबों से भरा मेरा सर,
टिकी होगी तुम्हारी गोद में।
तुम्हारी झुकी नजरें, ताक रही होगी मुझको,
और मैं, देखकर तुम्हारी नजरों में,
कुछ कह रहा होउंगा....
मैं इंतजार में हुँ और मेरी अधूरी कविता भी,
जो शायद तुम्हें मिल के पूरी हो जाएगी।
© आनंद राज 'रीतेय'
Wow..grttt !! :)
ReplyDeletemast!!
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