Thursday, 25 August 2016

इस बात को वर्षों हुए...

चेहरे पर मासूमियत लिए ,
जो बनावटी नहीं है।
वो खड़ा है,
उस पेड़ की छाया में।
जिसके छाया पर,
उसका हक पहला है।


अनजान है वो,
हर बात से,
जीवन के हर हालात से।
उजाले दिन से,
और काली रात से।
न खबर है उसे,
न कोई परवाह।
हुआ कल क्या?
क्या कल होगा?
फिर भी,
वो सचमुच खुश होगा,
उस   छाया में,
जिसपे उसका हक पहला है।

उसे विश्वास है,
पेड़ के जड़ पर।
जो पुराना नहीं है।
उम्मीद है उसे,
वर्षों तक के साथ का।
एक अटूट रिश्ता ,
जो चलेगा उम्रभर।


वक्त ने करवटें बदला,
कुछ ऐसा हुआ,
जो ना होना था।
वो भयानक रात,
वो आंधी,वो तूफान।
पर बेफिक्र वो सोया रहा,
सुबह हुई,आँखे  खुली ,  
सब कुछ बदल चुका था।
न वो रिश्ता रहा,
न वो छाया बचा।
उस आँधी में वो पेड़,
धराशायी हो चुका था।

इस बात को,
वर्षों हुए ।
बच्चा बड़ा हो चुका है,
समझने लगा है,
अपने जज्बातों को,
जीवन के हर हालातों को।
पर जब भी झांकता है,
वो अपने बीते कल में,
एक सूनापन लगता है,
बिना उस पेड़ के।
जिसपर ,
उसका हक पहला था।

अब वो पेड़,
वापस नहीं आएगा।
ना वापस आएगी,
उसकी मासूमियत।
पर आज भी,
महसूस होती है,
उस छाया की कमी।
और अफसोस भी,
की वो सींच नहीं पाया,
उस पेड़ के जड़ को,
जिसपर,
उसका हक पहला था।


-आनंद राज 'रीतेय'
(आत्म-कृति)

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