स्पीडबोट पर बैठे-बैठे मुझे बचपन की रेलगाड़ी याद आ रही है और ख़ासकर वे सारे पेड़ जो बहुत दूर तक हमारे साथ चल रहे होते थे फिर अचानक से एक नया पेड़ सामने आता था और पुराना वाला धीरे-धीरे गायब हो जाता था। खेत-खलिहान, नदी-नाला-नहर, गाँव-कस्बा और भी जाने क्या-क्या, ये सब एक-एक कर खिड़की के बाहर आता था और फिर चला जाता था।
पिछले आधे घंटे से हम स्पीडबोट में हैं और एक सीधी रेखा में लगातार माले शहर से दूर जा रहे हैं। आगे बढ़ती हुई नाव अपने पीछे पानी पर एक निशान छोड़ रही है और पीछे छूटता समंदर उस निशान को पलक झपकते ही ऐसे मिटा दे रहा है जैसा वहाँ कुछ हुआ ही न हो। लेकिन बार-बार टकराती लहरों के निशान स्पीडबोट पर ज़रूर देखे जा सकते हैं।
शहर और हमारे बीच हर तरफ़ सिर्फ पानी ही पानी है। माले शहर की ऊँची-ऊँची इमारतें दिख रही हैं पर वह लगातार पानी के पीछे छिपती चली जा रही है। एक बार को देखकर यही लगता है कि विशाल समंदर हमें रास्ता देकर, हमारे पीछे की पूरी दुनिया को निगलता जा रहा है। मैं जानता हूँ कि इस शहर के छिपने में पानी से कहीं ज़्यादा योगदान धरती की गोलाई का है। दरअसल, सच सार्वभौमिक ही क्यों न हो, उसे जानने और आँखों के सामने घटित होते हुए देखने में बहुत फ़र्क़ होता है।
हमारे सफ़र को लगभग पैंतालीस मिनट हो चुके हैं। पीछे सिर्फ़ अंतहीन समंदर रह गया है। अब पीछे देखने को हमारे पास कुछ और शेष नहीं रह गया था। बेहतर था कि पलट कर दूसरी तरफ़ देखा जाए और हमने भी वही किया। अब सामने से एक टापू धीरे-धीरे सतह से ऊपर उठता प्रतीत हो रहा है। वह देखकर ऐसा लग रहा है मानो शहर के बदले समंदर ने अपना एक हिस्सा हमें वापस किया हो।
- रीतेय
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