प्रिय विजय,
उम्मीद है तुम जहाँ भी हो सुकून से होगे।
मम्मी बताती हैं कि तुम्हें ख़त लिखने और सहेज कर रखने का बहुत शौक था। मैंने भी बचपन के दिनों में घर के भीतर मुंडेर से लटका पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्र का एक बड़ा सा बंडल देखा था। बाद के दिनों में जब दुनिया समझने लगा तो चोरी-छिपे तुम्हारी एक डायरी पढ़ी और एक डायरी मम्मी की भी। जब मम्मी की डायरी पढ़ रहा था तो शायद उन्होंने मुझे देख भी लिया था। उन्होंने उसमें वो तमाम बातें लिख रखी थीं जो उन्हें तुमसे बतानी रही होगी पर कभी बता नहीं पायी।
उस घर से जुड़ी तुम्हारी बहुत सी यादें हैं। चार-पाँच साल के बच्चे को तुम यह समझाने में समर्थ थे कि ज़िंदगी में प्राथमिकता कैसे तय करते हैं। बेड टाइम स्टोरी सुनाते हुए तुमने बताया था कि रावण असुर भले ही था पर उसमें भी कुछ अच्छे गुण थे। मुझे बचपन के दिनों से ही चीज़ों को बिना समझे रट लेना पसंद नहीं था और तुम इस बात को समझते थे। मेरे साथ के बच्चे जब इक्कीस से तीस तक का पहाड़ा कंठस्थ कर रहे थे, मैं उन्नीस का पहाड़ा पढ़ने में हिचकता था फिर एक दिन तुमने समझाया कि कैसे पहाड़ा दरअसल जोड़ और गुणनफल ही है। बिना काग़ज़-कलम इस्तेमाल किये मन-ही-मन जोड़-घटाव करने का तरीका आज तक याद है और यकीन मानो वो तरीक़ा मैं आज भी इस्तेमाल करता हूँ।
पिछले तीन दशकों में आसपास की दुनिया बहुत तेज़ी से बदली है। अब ज्यादातर लोग ख़त लिखना पसंद नहीं करते हैं। एक दूसरे से जुड़े रहने के लिए अब ख़तों के अलावा हज़ारों माध्यम हैं। इस दौड़ में मैं भी बहुतायत वाली दुनिया के साथ बढ़ा। पिछले तीस सालों में उँगली पर गिनने लायक़ तीन या चार ख़त लिखे। एक ख़त लगभग पंद्रह साल पहले तुम्हारे छोटे भाई को लिखा था, दूसरा ख़त आज से आठ-नौ साल पहले, बात-बात में ही एक लगभग अजनबी सी लड़की को लिखा, वह भी सिर्फ़ इसलिए कि उसे उस उम्र तक कभी किसी ने कोई चिट्ठी नहीं लिखी थी। सचमुच कितने अकेले होते होंगे वे लोग जिन्हें कभी कोई ख़त नहीं लिखता। संयोगवश तीसरा ख़त भी चार-पाँच साल पहले उसी लकड़ी को लिखा जब उससे थोड़ी जान-पहचान हो गयी और वह तुम्हारी पुत्रवधू बनने वाली थी। चौथा ख़त, जो कि एक जवाबी ख़त था, जयपुर के एक कवि-मित्र को लिखा जब उसे दिल्ली के पुस्तक मेले की बहुत याद आ रही थी। और यह शायद पाँचवा ख़त है जो तुम्हें लिखने की सोच रहा हूँ।
यह दौर स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दौर है। यहाँ अब अपनी बात औरों तक पहुँचाने के लिए त्वरित साधन मौजूद हैं। दुनियाभर की जानकारी उँगली के इशारे पर मिल जाती है। तुम आज की दुनिया में होते तो ये सारी चीज़ें तुम्हें भी रोमांचित करती। आज की दुनिया बहुत आगे की सोचती है, तुम भी अपनी दुनिया से आगे की सोचते थे।
सोशल मीडिया और इंटरनेट आज फादर्स डे सेलिब्रेट कर रहा है। फेसबुक पर आज एक पोस्ट देखा जिसमें लिखा था कि दुनिया के सभी माँ बाप अपने बच्चे से यही बोलते हैं कि कोई जबरदस्ती नहीं है - तुम जो पढ़ना चाहते हो, जो करना चाहते हो वही करो। लेकिन अपनी करवाते हैं।
पढ़ने के बाद सोचने लगा कि तुम्हें तो मौक़ा ही नहीं मिला हमें यह बताने का कि तुम हमें क्या बनाना चाहते थे? तुमने तो ये सब प्लान शायद मम्मी से भी नहीं डिस्कस किया होगा। तुमने खुद अर्थशास्त्र की पढ़ाई की, एक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाते भी थे। तुम्हें लिखने-पढ़ने का शौक था। तुम्हारी लाइब्रेरी खंगालते हुए मुझे हिंदी साहित्य की किताबें दिखी, कुछ किताबें मेडिसिन्स की भी थीं, कुछ फ़ारसी-अरबी लिपि में छपी उर्दू की किताबें भी थीं, संभवतः वो लिटरेचर की किताबें ही रही होंगी। तुम्हें फोटोग्राफी का भी शौक था। विजय, मुझे लगता है तुम अगर अपने कुछ अधूरे शौक हम पर जबरन भी थोप देते तो भी हम कुछ अच्छा ही करते क्योंकि तुम्हारे शौक यक़ीनन बहुत अच्छे थे।
मैं जानता हूँ कि पिता को उसका नाम लेकर संबोधित करना अच्छी बात नहीं है पर मुझे लगता है कि नाम लेकर बात करते हुए मैं अपने आपको तुम्हारे ज़्यादा करीब पाता हूँ और दूसरी बात यह कि बीते पच्चीस-तीस सालों में ‘पापा’ शब्द का इस्तेमाल मेरे लिए इतना दुर्लभ हो गया कि अब इसका उपयोग करते हुए भी अजीब लगता है। हो सकता है भविष्य में जब तुम्हारी तीसरी पीढ़ी इस लफ्ज़ का इस्तेमाल मेरे लिए करे तो मैं इस शब्द के साथ थोड़ा सहज हो जाऊँ।
तुम्हारा बेटा,
रीतेय