आप यह मान कर चलो कि यह कहानी मेरी है, वैसे आपकी भी हो सकती है। बात बस मानने और न मानने की है।
पिछले कुछ दिनों से निर्मल वर्मा का उपन्यास ‘वे दिन’ मेरे साथ घर से ऑफिस और वापस घर तक का सफर कर रहा था। फिर इसी बीच प्रज्ञा के जन्मदिन पर ऑफिस से छुट्टी लेकर कहीं बाहर जाने का प्लान बना तो मैंने अपने हमसफ़र के साथ-साथ इस नए साथी को भी साथ ले लिया।
सुबह छह बजे की फ्लाइट थी और अपनी मिडल क्लास मेंटालिटी को मेंटेन करते हुए हमने समय से दो-तीन घंटे पहले एयरपोर्ट जाने का फ़ैसला किया। एयरपोर्ट पहुँचने के लगभग तीस मिनट बाद हम उस दरवाज़े के सामने खड़े थे, जहाँ से लगभग दो घंटे बाद बोर्डिंग शुरू होनी थी। बहरहाल, मेरे पास इतना समय था कि निर्मल वर्मा और रायना रैमन के साथ प्राग घूमा जा सके। आँखों के सामने एक-एक कर पन्ने पलटते जा रहे थे और मैं एयरपोर्ट की कुर्सी पर बैठे-बैठे प्राग की गलियों में दो अजनबियों के बीच बढ़ती हुई कहानी को घटते देख रहा था। किताब कब ख़त्म हुई, पता ही नहीं चला। घड़ी देखी तो अब भी बोर्डिंग में लगभग बीस-पच्चीस मिनट बाकी थे, लेकिन अच्छी बात यह थी कि अब ‘वे दिन’ की कहानी किताब से निकलकर मेरे ज़ेहन में आ चुकी थी।
कुछ देर में बोर्डिंग शुरू हुई। मैं अपनी सीट तक पहुँचा और बिना एक और मिनट गँवाए सोने की कोशिश करने लगा। इस दौरान अपने बारे में एक और बात समझ आई कि हम जैसों की यह आदत है कि हज़ार-दो हज़ार रुपये बचाने के चक्कर में हम सबसे पहला सौदा अपनी नींद से ही करते हैं। ख़ैर, यह कोई नई बात नहीं है। रात भर का जागा हुआ था, शायद नींद भी बहुत जल्दी आ गई।
जब आँख खुली तो हम मुंबई के आसमान में थे। मैंने खिड़की से बाहर झाँकने की कोशिश की, लेकिन बीच वाली सीट से बाहर झाँकना और बाहर की चीज़ें देख पाना बहुत मुश्किल होता है। हाँ, मैं अक्सर यही करता हूँ। एक-आध हज़ार के चक्कर में ऑड ऑवर्स की फ्लाइट बुक करता हूँ, वेब चेक-इन करते हुए पेड सीट्स को ऐसे इग्नोर करता हूँ, जैसे उस एक सीट की पेमेंट करते ही मेरा बैंक बैलेंस ख़त्म हो जाएगा। कई बार तो एयरपोर्ट पर बैगेज ड्रॉप करते वक़्त डॉक्यूमेंट वेरीफाई कर रहे अधिकारी से अनुरोध करता हूँ कि अगर वे बिना अतिरिक्त रुपये लिए मेरी सीट अपग्रेड कर सकें तो कर दें। दस में से नौ बार बिना पैसे के विंडो सीट मिल भी जाती है। इस दफ़ा मैंने इस फ्लाइट के लिए सीट अपग्रेड करने की रिक्वेस्ट नहीं की, क्योंकि अगली फ्लाइट में विंडो सीट होना ज़्यादा ज़रूरी था। वैसे भी, एक ही दिन में, एक ही आदमी से, एक ही चीज़ के लिए दो बार गुज़ारिश करना ठीक भी नहीं लगता।
दूसरी फ्लाइट मुंबई से आगे के सफ़र के लिए थी। जो आदमी देश से बाहर जाने के नाम पर बस नेपाल तक गया हो, उसके लिए समंदर पार किसी और मुल्क के लिए डायरेक्ट फ्लाइट के बजाय कनेक्टिंग फ्लाइट लेना कोई बड़ी बात नहीं है। अपने बचाव में यह कहा जा सकता है कि लगातार पाँच-छह घंटे फ्लाइट में बैठना मुश्किल लगा, इसलिए ऐसा किया गया, पर यह कहना सही नहीं होगा।
मुंबई एयरपोर्ट पर दोनों फ्लाइट्स के अराइवल और डिपार्चर में लगभग दो घंटे का समय था, लेकिन ये दो घंटे लगभग घंटे भर में बीत गए। पिछले नौ साल से खुली और खाली किताब की तरह मेरा पासपोर्ट अपने पहले स्टाम्प के इंतज़ार में था और शायद मैं भी। होने को तो यह उस पासपोर्ट का तीसरा ठप्पा हो सकता था, पर उसकी कहानी किसी और दिन। इतने सालों में सैकड़ों डोमेस्टिक फ्लाइट लेने के बाद मेरी भी इच्छा थी कि इंटरनेशनल एयरपोर्ट के इमीग्रेशन काउंटर से आगे तक का सफ़र तय किया जाए। कुल मिलाकर अतिरिक्त प्रोसेस और एक्साइटमेंट—दोनों की मौजूदगी ने दो घंटे को घंटे भर से कम का बना दिया।
बोर्डिंग शुरू हुई और इस बार फ्लाइट में विंडो सीट ले ली गई थी। पैसे मैंने इसके भी नहीं दिए थे, हाँ, फ्री अपग्रेड का सफल अनुरोध ज़रूर किया था।
एक बार फिर हम मुंबई के आसमान में थे। खिड़की के बाहर मुंबई की गगनचुंबी इमारतें साफ़-साफ़ दिख रही थीं और थोड़ी ही देर में मुंबई की कोस्टलाइन नज़र आने लगी। कोस्टलाइन के आगे एक अथाह समंदर।
यह उड़ान ज़िंदगी की तमाम उड़ानों से बिल्कुल अलग थी। इसके पहले आसमान में जाते हुए मेरा शहर पीछे रह जाता है, अबकी बार मेरा देश पीछे रह गया था। पहले आसमान से, धुँधली ही सही, पर ज़मीन नज़र आती थी। इस बार हिन्द महासागर अपने आप में एक विशालकाय आईना बना हुआ था और उसमें आसमान से नीचे देखते हुए भी आसमान ही नज़र आ रहा था।
जब पहली बार अरब सागर को ऊपर से देखा तो थोड़ा डर भी लगा था। फिर कुछ देर बाद साफ़ आसमान से नीचे नीला समंदर देखते हुए वह डर धीरे-धीरे ख़त्म हो गया। यह वाक़ई एक सुखद अनुभव था।
जब यह लिख रहा हूँ तो एक बार फिर निर्मल वर्मा का ‘वे दिन’ मुझे याद दिलाने लगा है कि सुख दो तरह के होते हैं—एक बड़ा सुख, एक छोटा सुख। बड़ा सुख हमेशा पास रहता है, छोटा सुख कभी-कभी मिल पाता है।
पहली बार समंदर के ऊपर उड़ान भरना, खिड़की से हिन्द महासागर में तैरते जहाज़ देखना—ये सब छोटे सुख हैं। और बड़ा सुख—इतनी ऊँचाई पर साँस ले पाना और इन छोटे-छोटे सुखों का अनुभव कर पाना। वाक़ई, इससे बड़ा सुख कोई और नहीं है।
— रीतेय
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