मेरा एक छोटा भाई है और एक बड़ी बहन। बचपन में हमारी पढ़ाई-लिखाई लगभग साल-दो साल के अंतर में शुरू हुई होगी।
मतलब पहले दीदी के लिए स्लेट-पेंसिल आया होगा, फिर उसका जब एक कोना टूट गया होगा तो वो मुझे मिला होगा। और जब उसको हम किसी दिन ग़ुस्से में दो टुकड़ों में तोड़ दिए होंगे तो एक टुकड़ा छोटे भाई को मिला होगा।
एक बार तो ऐसा हो गया कि भाई ने उस आधे टुकड़े के भी दो टुकड़े कर दिए। अब उसमें एक बार में ३-४ अक्षर से ज़्यादा लिखने की जगह नहीं थी। मतलब क, ख, ग, घ भी ङ तक नहीं पहुँच पाता था। फिर मम्मी ने एक जुगाड़ निकाला। वो उसको साथ में किचन ले जाती थी और रोटी बनाते हुए चोकर वाली प्लेट में बोलती थी कि तुम उँगली से लिखो। जब तक एक रोटी बनती थी, वो एक अल्फाबेट सीखता था। अब भाई कितना अल्फाबेट लिख पाएगा, ये इससे तय होता था कि उस दिन घर में रोटी कितनी बनेगी। न घर में कभी २६ रोटी एक साथ बनीं और न ही वो A से Z तक एक साथ लिख पाया। ऊपर से हिंदी वर्णमाला में तो ५२ अक्षर हैं, उसका पूरा होने का तो सवाल ही नहीं उठता था। वो कभी ट ठ ड ढ से आगे नहीं जा पाया।
ख़ैर, इंडियन लोअर मिडल क्लास में यही होता है। अब न होता हो, पर हमारे ज़माने में तो ऐसा ही होता था। बाद के बच्चे तो दुनिया में आते भी इसलिए थे कि पहले वाले के यूज़ किए सामान को री-यूज़ कर सकें। सच में घर के दूसरे बच्चे को नई चीज़ के नाम पर बस ‘नाम’ ही मिलता था। और अगर गलती से सेम जेंडर हो गए, तो फिर राइमिंग के चक्कर में नाम में भी समझौता करना पड़ता था — सोनू-मोनू, बबलू-डब्लू, चिक्कू-भिक्कू। मिलेनियल तक तो यही ट्रेंड था, Gen Z का नहीं पता।
वैसे स्लेट के मामले में जो भी हुआ हो, नाम के मामले में हमारे घर वाले थोड़े क्रिएटिव थे। हमारे पास दो-दो नाम थे। एक नानी गाँव की तरफ़ से और दूसरा दादी गाँव की तरफ़ से।
बड़ी बहन पढ़ने में तेज़-तर्रार थी, प्रेशर में हमको भी पढ़ना पड़ा। और वो प्रेशर जब तक छोटे भाई तक ट्रांसफ़र होता, उसके पहले कुकर की सीटी बज गई। और सीटी ज़्यादा बजने से जैसे चावल ढीला हो जाता है, वैसे ही भाई की पढ़ाई ढीली रह गई। एक उम्र तक भाई समय-समय पर प्रेशर लेता रहा और उसकी सीटी बजती रही। फिर एक दिन भाई ने ढक्कन खोलकर घरवालों के सामने रख दिया कि अब न हो रही पढ़ाई।
उस दिन हमको एक रियल लाइफ़ लॉ समझ आया —
“Pressure among siblings cannot be created or destroyed, it can only be transferred from one sibling to another.”
भाई को लगता रहा कि मेरे चक्कर में लोग उससे पढ़ने-लिखने को बोलते थे। और मुझे लगता था कि अगर दीदी कुछ बन गई और हम दोनों भाई नकारे रह गए, तो इस पितृसत्तात्मक समाज में पिता के साथ-साथ पितामह तक की नाक कट जाएगी।
- रीतेय
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